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Sunday, June 24, 2012

यह राजनैतिक उद्दंडता है ...



राजनैतिक शिष्टाचार की बातें अब बे- मायने हो गई है .यह शिष्टाचार जब ख़त्म हुआ तो राजनैतिक अराजकता बढ़ने लगी ,नतीजा यह हुआ कि कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और वे राजनीति से नीति दूर कर राज़ करने कराने में कामयाब हो गए .अब जो चल रहा है वह राजनैतिक उद्दंडता का दौर है . इन उद्दंडताओं   के लिए राजनैतिक दलों में प्रवक्ताओं का पद स्थापित किया है , जो पद पर नहीं है पर वाकई उद्दंड  है वे भी जिम्मेदारी निभा रहे है . लगभग हर राजनैतिक  दल में ऐसे लोग  काम पर राजनैतिक उद्दंडता के लिए लगाये गए हैं .नाम विशेष की चर्चा इसलिए नहीं कि यह सबको जाहिर है किस दल में कौन राजनैतिक उद्दंडता का काम बखूबी निभा रहा है. 
हरहाल ताज़ा मामला नीतीश - मोदी विवाद है . क्या इस मामले के कोई नैतिक मायने हैं .इस पूरे मामले में राजनैतिक नैतिकता कहीं नहीं दीखती. बहुत से विवाद ऐसे खड़े हो रहे हैं जैसे कल ही कोई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विपक्ष के खेमे से आकर स्थापित  हो जाएगा जबकि देखा जाए तो आज विपक्ष के पास ऐसा कोई दमदार नाम ही नहीं है जो पीएम और राष्ट्रपति के लिए दमदारी से रखा जा सके .  नीतीश  ने बे - समय पीएम की चर्चा क्यों की.  नीतीशकुमार  एनडीए के प्रमुख और बड़े नेता हैं राजनीति के समझूं हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी का नाम चला तो वे एकदम फिसल पड़े ,गोया कल ही कोई नरेन्द्र मोदी पर सहमति बन जाएगी और वे पीएम् हो जायेंगें . सहमति की राजनीति जब आप कर रहे हैं गठबंधन के गठजोड़  में हैं तो आप बाहर आकर कैसे फूफकार सकते हैं ,ऐसा कोई कर रहा है तो इसमे न कोई नीति है , न शिष्टता है और न सहमति है . जो है तो वह सिर्फ नाराजी है, गुस्सा है  या चाल है लेकिन यह सब भी उद्दंडता तक पहुँच गया है .राष्ट्रपति के लिए भी असहमति भीतर से नहीं निकली है  बाहर से भीतर गयी है ,आखिर यह सब क्या है ?  नीतीश  के बाद शिवानन्द तिवारी यदि मुखर हुए हैं तो किस राजनीति के चलते ?
संघ ने हिंदुत्व की वकालत की तो कोई नया नहीं किया इसलिए कि उनका  अजेंडा ही हिंदुत्व है और यह उनका खुला अजेंडा है , यह कहना भी गलत है कि संघ ने मोदी का बचाव किया है . संघ ने सिर्फ अपनी नीति का बचाव किया है और चर्चा में मोदी थे इसलिए यह मोदी का बचाव दीख रहा है . मीडिया के जो लोग यह हल्ला मचा रहे हैं कि संघ ने मोदी का बचाव कर मोदी के प्रति समर्थन जाहिर किया है वे सब कच्ची  पत्रकारिता कर हैं और रीति नीति की व्याख्या कर ही नहीं रहे हैं . दरअसल आज पत्रकारिता भी राजनैतिक उद्दंडता का हिस्सा बन गयी है इसमे समझ कम और उत्तेजना ज्यादा है ऐसा माहौल न विकास कर पाता है और न ही दिशा तय कर पाता है .
रअसल गठबंधन आज तात्कालिक मायनों से चल रहे है इसमे वफ़ा का स्थान है ही नहीं .सबकुछ निजी स्वार्थ और हित के अनुसार चलाया जा रहा है और लोग अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं इससे राजनीति का नुकसान हो  रहा है . नीतियों की गहराई कहीं नहीं है और सतह पर बढ़ती उद्दंडता इसे ख़त्म करने पर तुली है आश्चर्य  यह है कि  इस अनैतिक काम में बड़े राजनेता भी जुटे हैं .
surendra.bansal77@gmail.com

Sunday, June 17, 2012

प्रणब का राजनैतिक रिटायर्मेंट



अब यह तय है कि राजनैतिक हुनरबाज़ प्रणब मुखर्जी देश के तेरहवें राष्ट्रपति हो सकते हैं , यूपीए ने उनके नाम पर मोहर लगा कर उन्हें देश का प्रथम नागरिक होने की मान्यता दे दी लेकिन इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि २०१४ में उनकी संभावित  प्रधानमंत्री की अंतर्उपजती भावना लगभग समाप्त हो गयी है,जाहिर है देश का प्रधान होने का राज़  दायित्व अब उनके पास नहीं आ सकेगा .

प्रणब मुखर्जी १९६९ में जब राज्य सभा के लिए चुने गए तब से आज तक उन्होंने केंद्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहकर महत्वपूर्ण  मंत्रालयों और आयोगों का काम संभाला है . वे रक्षा मंत्री भी रहे ,विदेश मंत्री भी और वित्त मंत्री भी रहे हैं . और यह मामूली नहीं है इसलिए भी कि उनका यह तजुर्बा ५३ वर्षों के राजनैतिक जीवन से तैयार हुआ है . हालाँकि राजनीति में विवाद  न हो ऐसा होता नहीं है और आरोप भी लग जाते हैं . उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है . इंदिरा गाँधी की मौत के बाद १९८४ में उन्हें राजीव गाँधी ने अलग थलग कर दिया था वे कांग्रेस से हटकर राष्ट्रीय  समाजवादी कांग्रेस  के नाम से नई पार्टी भी खड़ी कर चुके थे लेकिन जब नरसिम्हाराव आये तो उन्होंने प्रणब दा को योजना आयोग में अध्यक्ष बना कर फिर कांग्रेस  में शामिल कर लिया . जाहिर है वे कांग्रेस के बागी रहे हैं और राजीव से उनके मतभेद भी रहे हैं और सोनिया गाँधी भी इस बात को जानती हैं फिर भी उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो इससे कांग्रेस  को कुछ फायदे है . 
पहला तो यह कि कांग्रेस  के पास उनकी पार्टी के भीतर प्रणब मुखर्जी से बेहतर कोई उम्मीदवार था ही नहीं , दूसरा फिर उन्हें उस नाम पर विचार करना होता जो प्रणब से बेहतर तो होता लेकिन पार्टी से बाहर से होता , तीसरा डॉ अब्दुल कलाम जो सर्वसम्मत उम्मीदवार हो सकते थे वे पार्टी से बाहर और एनडीए के समर्थन से राष्ट्रपति हो चुके हैं .इसलिए हर हाल में कांग्रेस के लिए फायदेमंद यही था कि प्रणब मुखर्जी का नाम आगे लाया जाए ,इससे कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि उसका एक बड़ा नेता प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर हो गया है , इससे पार्टी संभावित विवाद से भी बच गयी है . मनमोहनसिंह दो कार्यकाल पूरे कर रहे है तीसरी मर्तबा वे शायद ही बनाये जाते ऐसे में किसी ऐसे  नाम को विचार में लाना ही होता. कांग्रेस के भीतर प्रणब मुखर्जी के नाम पर चर्चा करना और उन्हें ही मंज़ूर करना एक मजबूरी होती , शायद वे ही अगले प्रधानमंत्री होते , इस पर अब विराम लग गया है . अब मनमोहनसिंह तीसरी बार प्रधान होने का इतिहास बना सकते है या कोई और के लिए जगह बन गयी है यह साफ़ हो गया है .

देश का सर्वोच्च होना गौरवमयी हो सकता है लेकिन देश का प्रधान होना उस राज़ तंत्र का प्रमुख होना है जो लोकतंत्र से चलता है , इसलिए लोकशाही का राजा तो प्रधानमंत्री ही होता है जो  कभी गुमनाम नहीं होता अपने नैतिक राजधर्म से देश को संचालित करनेवाला वह प्रमुख व्यक्तित्व होता है , प्रणब मुखर्जी के लिए यह अवसर लगभग चला गया है वे सर्वोच्च तो हो जायेंगें लेकिन फिर भी देश के प्रधान होने का  राजनैतिक कर्म अब वे शायद नहीं कर पायेंगें .इसे उनका राजनैतिक रिटायर्मेंट कहे तो अनुपयुक्त नहीं होगा ,जिसे कांग्रेस पार्टी ने उन्हें प्रदान कर दिया है .

Sunday, June 10, 2012

अस्तित्व के लिए मिशन २०१४



भाजपा में यह  अस्तित्व का दौर चल रहा है .पहचान तो भाजपा में बहुत से लोगों की बनी हुई है लेकिन अस्तित्व बहुत  से लोगों का बचा नहीं है ,जो कुछ है वह खंडित है या उसे चुनौती है . कुछ लोग अतिमहत्वाकान्क्षाओं  के हिलोरे खा रहे हैं . लग रहा इन सबके चलते देश की सबसे बड़ी राजनैतिक विपक्षी पार्टी हाशिये पर चली गई है .
दरअसल नरेन्द्र मोदी और नितिन गडकरी की नव युगल सरकार ने बहुत से लोगों को पार्टी के भीतर हिलाया है . लोग समझ गए हैं पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बीच गठजोड़ लाइन में खड़े लोगों को सरकाकर आगे बढ़ने की कवायद है. पार्टी के दो बड़े नेता जब अपने अपने अस्तित्व के लिए गठजोड़ कर लें तो यह उन लोगों के लिये बड़ी चुनौती है जो  पार्टी के भीतर व्यवस्था के अनुरूप कार्य कर रहे हैं .बहाना चाहे संजय जोशी बने हों लेकिन संजय जोशी को पार्टी से हलाल करना एक रेजिमेंट को तबाह कर देना है . संजय जोशी कोई मामूली हस्ती नहीं थे उनकी पार्टी के भीतर मौजूदगी एक तरह से संघ की मौजूदगी थी . संजय जोशी कभी मॉस लीडर नहीं रहे उनका काम दफ्तरी रहा है और नीति नियंता  पर संघ की दृष्टि  की तरह भी रहा है .

वैसे नितिन गडकरी संघ की मेहरबानी से ही पार्टी अध्यक्ष पर काबिज़ हुए थे और जब वे अध्यक्ष बने तो कोई सोच नहीं सकता था कि वे पार्टी अध्यक्ष बन भी सकते हैं उनका डील डौल भी वैसा नहीं था जिसमे एक  राजनेता लोकनेता की छवि दिखाई दे.लेकिन वे अध्यक्ष बने और समय भी उन्हें पूरा मिला . फिर भी पार्टी ने उनके नेतृत्व में २०१४ की चुनावी तैयारी  का मजबूत खाका तैयार नहीं किया और उनका टर्म पूरा होने आ  गया . अब मोदी के भरोसे ही उनकी दूसरे टर्म की बुनियाद तैयार हुई है लेकिन यह उनकी योग्यता का सबूत नहीं है . एक तरह से पार्टी अध्यक्ष भावी प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे हैं .

नरेन्द्र मोदी गुजरात को चमकाने और मुख्यमंत्री रहते हुए अग्रिम  राष्ट्रीय नेता  की तरह उभरने वाले राजनीति के फिलवक्त इकलौते शख्श  हैं अपनी बनती हुई पहचान  को मोदी भी भुनाना चाहते हैं .और वे भी जो कर रहे हैं  जिस तरह कर रहे हैं वह भाजपा को बचाने ,बनाने और उभारने का काम नहीं हैं, उनकी चुनौती पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी से लेकर गुजरात के केशुभाई पटेल और संजय जोशी तक है . मोदी इन चुनौतियों से निबटने की तैयारी में जुट गए हैं , मुंबई  में राष्ट्रीय कार्यकारीणी से लेकर गुजरात की प्रांतीय कार्यकारिणी तक मोदी ने अनेक कवायदें की हैं और उनकी हरकतों से हताहत होने वालों की संख्या ज्यादा है . आज पार्टी के भीतर एक आग सुलगती नज़र आ रही है जो सुषमा स्वराज , अरुण जेटली जैसे अनेक नेताओं तक है , इस मसले पर बहुत से नेता और संघ के कर्ता भी अब बंटते  नज़र आ रहे हैं .

जाहिर है भाजपा के भीतर यह लड़ाई चालू हो चुकी है २०१४ के लिए पार्टी तैयार हो या न हो जो दिख रहा है वह यह है कि अस्तित्व के लिए मिशन २०१४ का दौर चल रहा है इसमे पार्टी कहीं नहीं दीख रही  है शायद २०१४ में सरकार बनाना उनका अजेंडा नहीं है . ऐसा है तो कांग्रेस के लिए यह अच्छा संकेत है .

Saturday, May 26, 2012

आखिर कब बदलेगी ये ठगस्वरुपनी राजनीति



पेट्रोल की कीमतों में अप्रत्याशित  वृध्दि से जहाँ सारा देश स्तब्ध है वहीँ राजनैतिक दलों के आचरण पर भी हैरानी हो रही है . आज कोई आवाज़ ऐसी कहीं नहीं है जो आम लोगों के मुद्दे पर सरकार को हिला दे . सरकार ऐसी नहीं है जो आम लोगों के हित के फैसले करे. आम लोग ऐसे नहीं है जो इन लोगो से निबटने और दो चार होने का माद्दा रख  सके .ये   ठगस्वरुपनी राजनीति  है जो चल रही है  .  इसलिए देश में मनमोहन के मनमर्जी की सरकार चल भी रही है और फलफूल भी रही है . यूँ कांग्रेस को इस बात के लिए बधाई दी जाना चाहिए कि पक्ष विपक्ष के तमाम लोग और यहाँ तक कि मीडिया भी उनके स्थापित प्रधानमंत्री को एक ईमानदार प्रधानमंत्री मानता है और आश्चर्यजनक यह भी कि इस सरकार में  तमाम बड़े घोटालों और आरोपों के वाबजूद भी . इससे क्या समझा जाए यह बड़ा मौजूं है .

चूँकि प्रधान मनमोहन हैं इसलिए सरकारी मनमर्जी भी उनकी ही मानी जाना चाहिए लेकिन मौजूं  यह है कि यदि घोटाले है ,आरोप हैं फिर भी वे यदि ईमानदार हैं तो आखिर वे हैं क्या  ? वे आरोपियों को पकड़ नहीं सकते , घोटालों को रोक नहीं सकते , देश में अपनी ईमानदारी को चला नहीं सकते फिर वे आखिर कर क्या सकते हैं ,और कर क्या रहे हैं हैं ? वे इतने असहाय क्यों हैं और नाकाबिल सूबेदार क्यों नज़र आते हैं . क्यों उनका मन मौन ही रहता है और उनका मोहन  राष्ट्र से मोह क्यों नहीं कर रहा है आखिर किस मनमोहिनी के चक्कर में मनमोहन हैं. शायद उनकी मनमोहिनी प्रधानमंत्री बने रहने की है और इसमे वे सफल हो रहे हैं . एक मीडिया चैनल पर कोई महिला चीख कर कह रही थी हमें उम्मीद थी कि ये अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री हैं . देश के लिए कुछ करेंगें लेकिन लगता है ये अर्थशास्त्र के फैलुयर स्टूडेंट हैं . देश को सबसे ज्यादा समय तक अपने राज़ में रखने में कामयाब कांग्रेस पार्टी को भी लगता  है उन्हें सबसे काबिल प्रधानमंत्री मिला है , एक ऐसा प्रधान बड़ी मुश्किल से मिलता है जो मनमर्जी से नहीं चलता , जिसकी ईमानदारी का डंका बजता है , जो किसी तरह की राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं रखता है , न अपनी ताकत बढाता है और न ही किसी को कमज़ोर करता है . इस काबिलियत के चलते ही वे दोबारा प्रधानमंत्री चुन लिए गए ,और हो सकता है कि मौका मिला तो तीसरी बार भी प्रधान हो जांयें .

लेकिन देश के इस हालात पर सिर्फ सरकार ही नहीं देश का हर राजनैतिक दल भी जिम्मेदार है कोई राजनैतिक दल आज आम लोगों के लिए  राजनीति कर रहा हो ऐसा नहीं लगता , इस समय हर कोई अपना राजनैतिक नुकसान बचाने में लगा है सारी कवायदें आम के लिए नहीं आम लोगों के जरिये अपना वजूद अपना ,अस्तित्व, अपनी पहचान और सबसे ज्यादा अपना राजनैतिक नुकसान बचाने की है .देश का सबसे बड़ा विपक्षी दल भाजपा मुंबई में कार्यकारिणी की बैठक कर सरकार पर गुर्रा रही है लेकिन उसे अपनी बैठक में आत्मवलोकन करना चाहिए था. बीते चार पांच सालों में उसने आम लोगो के हित में राष्ट्र हित में कितने मुद्दे उठाये , कितने आन्दोलन प्रदर्शन किये ,कितने मामलों पर सरकार को संसद में घेरा , कितना हंगामा किया उन सबका का क्या अंजाम रहा ,सरकार को कितना झुकाया उससे ज्यादा कितना उसने आम लोगों का साथ दिया , इसका सक्सेस रेट क्या है , राजनीति के शुचि तत्वों से  कितना दूर रहे और क्यों रहे , कैसी राजनीति और कैसे राजनेता हम दे रहे हैं इस पर विचार घर के भीतर होता है लेकिन भाजपा अपनी कार्यकारिणी की बैठक में कोसने की राजनीति कर रही है और इसमे उसके तमाम बड़े नेता शामिल है .यही हाल ममता बनर्जी के तृणमूल की ,वाम दलों की ,एनडीए के घटक दलों की ,यूपीए के दलों की है . कोई राजनैतिक दल आज आम लोगो के साथ नहीं आम लोगों के बहाने अपने नुकसान को बचाने में लगा है .

इसलिए यह जरुरत आन पडी कि कोई आम जन से ऐसा नेता उभरे जो आम लोगों की भावनाओं का नेतृत्व कर सके .इस सोच को अंजाम देने के लिए महाराष्ट्र के सामाजिक नेता अन्ना हजारे को आगे लाया गया , भ्रष्टाचार के मुद्दे पर  जितना हो हल्ला हुआ वह ऐतिहासिक  था , हज़ारों लोग ऐसे ही सड़कों पर नहीं आ जाते तुलना भी यूँ ही गाँधी से नहीं हो जाती  लेकिन यहाँ भी राष्ट्र और लोग ठगा गए . इस आन्दोलन से भी जुड़े लोगों ने  महज़ अपने को स्थापित करने का काम ही किया , सबने अपने को बचाने की कोशिश  की और समझोते कर वापस लौट गए . जैसे आंधी आती है तो लौट भी जाती है उसी तरह यह आन्दोलन लौट गया अब फिर लौटेगा यह आन्दोलन तो क्या पता किस अंजाम तक जायेगा या लौट - लौट कर आता रहेगा .

आम जन भी जितना परिपक्व दीखता है उतना है नहीं . राजनीति की मोहक  चालों में वह फंसता रहा है और पिटता रहा है . राजनीति ने आज लोगों को भी बेदम कर दिया है . ३१ मई को भारत बंद है राजनैतिक दल अपनी ताकत बतायेंगें लेकिन क्या होगा अंजाम , क्या हम फिर ठगे जायेंगें , आखिर कब बदलेगी ये ठगस्वरुपनी राजनीति , जागो भारत जागो !
सुरेन्द्र बंसल
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Friday, May 25, 2012

चलती राह में अकेला कोई साथ मिल जाए तो बात क्या है

चलती राह में अकेला
कोई साथ मिल जाए तो बात क्या है ,
नहीं हो बहाना किसी फहमी का
फिर भी दिल खुश  हो जाए तो बात क्या है ,
जहाँ नहीं हो विश्वास
वहां कोई आस बन जाए तो बात क्या है ,
तनहा में गुजरते हुए
अपनापन कोई दे जाए तो बात क्या है ,
बढ़ते हुए दर्द की
कोई दवा बन जाये तो बात क्या है .
जिंदगी कटती रहे कैसी भी
दिल में सुकून हो तो बात क्या है ,
टूटे चाहे कितने ही रिश्तें
चाहत का एक जोड़ मिल जाए तो बात क्या है .
चलती राह में अकेला
कोई साथ मिल जाए तो बात क्या है ,
सुरेन्द्र बंसल
४;४० शाम २५ मई २०१२




Saturday, May 19, 2012

ये तो लायक ना थे

ये तो लायक ना थे 

देश में बहुत  से ऐसे लोग हैं जो किसी लायकी के नहीं हैं लेकिन  नायक हैं इसलिए लायक हैं , सिरमौर हैं,सबसे ऊपर हैं ,अहम् हैं,और कहीं न कहीं देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं .ताज़ा उदाहरण बॉलीवुड किंग कहे जाने वाले शाहरुख़ के उस रुतबे का है जो उन्होंने एक अदने से सुरक्षा कर्मी पर झाडा . वैसे आई पी एल में अकेले शाहरुख़  ही नहीं उनके साथ विवादित कांड में शामिल मुंबई क्रिकेट एसो के पदाधिकारी भी हैं . यह सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है तमाम ओहदेदार जहाँ कहीं अपना रुतबा दिखाते हैं ऐसी ही हरकतें करते हैं , कभी कभी बात शाहरुख़ जैसे मामले तक बिगड़ जाती है .

शाहरुख़ का वानखेड़े विवाद सामयिक घटना है लेकिन हमें ऐसी वारदातों और उसके पीछे बने वलय वाले मामलों में इसे प्रतिनिधित्व घटना  मानना चाहिए . ऐसी तमाम घटनाएं उस दर्जे का नतीजा है जो इस तरह के लोग अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं . दरअसल आगे बढ़ते हुए और चढ़ते  हुए  को लोग कुछ ज्यादा ही ऊँचाइयों पर पहुंचा देते हैं . अक्सर वीआयपी कहे जाने वाले जीव तत्वों के साथ ऐसा ही होता है . ये जीवतत्व अपने को  जितना ऊपर देखते हैं उतना ही बड़ा पाते हैं और ऐसे में हर कोई उनसे छोटा हो जाता है .

शाहरुख़ ने वानखेड़े स्टेडियम में जो रौब झाडा वह उसके तमाम फेंस की दी हुई ऊंचाई का नतीजा है , जब भी इज्ज़त बढ़ती है तो रौब- रुआब अपने आप आ जाता है , शाहरुख़ ने अपने अभिनय से वानखेड़े पर दिखा दिया कि रुतबा  क्या होता है  . जरुरी नहीं कि शाहरुख़ इस मामले में दोषी हों हम बात सिर्फ रौब झाड़ने वाले  लोगों की कर रहे है जो उनको मिली शोहरत  से पनपती और उपजती है .दरअसल हर वीआयपी अपनी एक विधा में पारंगत होता है इसीलिए वह नेता होता है ,अभिनेता होता है ,लेखक होता है ,पत्रकार होता है , खिलाडी होता है ,प्रधान होता है , बड़ा होता है और न जाने क्या क्या होता है . पर क्या उसकी एक विधा जिसका वह पारंगत है उसकी तमाम हरकतों को खासियत  और सर्वमान्य बना देती है , नहीं ... पर देश में यही चल रहा है जो जहाँ वीआयपी है अपने को हर विधा का मास्टर समझ लेता है और हर जगह अपने को एक नेतृत्व करने  वाले में स्थापित  कर लेना चाहता है वह आम तो है ही नहीं.... ऐसा क्यों ? 

भाई मैं एक पत्रकार हूँ और उस क्षेत्र के बाहर एक आम नागरिक हूँ यह चेतना हम में क्यों नहीं हैं . जितने और जो नियम  कानून  कायदे आम लोगो के लिए हैं वह सब मुझ पर भी है , मेरी विधा , मेरी पारंगतता  और मेरा पैसा सामाजिक और राष्ट्रीय नियमों को कैसे खरीद सकती है मुझे मेरा दायरा मालूम होना चाहिए ऐसा क्यों नहीं हो रहा है हर वीआयपी अपने को सर्व व्यापी और इतना लायक समझने लगा है कि वह दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण करने लग  गया है  दरअसल ऐसे लोग ना तो लायक थे और ना लायक हैं . यह समझना जरुरी है .
सुरेन्द्र बंसल 
सुरेंद्रबंसल@जीमेल.कॉम

Wednesday, May 16, 2012

सम्बन्धों की खुशफहमी

 
सम्बन्धों की खुशफहमी में
नहीं रहना ऐ मेरे दोस्त ,
चलती जिन्दंगी में यहाँ
हर कोई अकेला है ,
तेरे आगे-पीछे , दांयें - बाएं
बहुतेरे  लोग हैं
पर सब मुसाफिर हैं यार ,
सब अपने लिए ही जी रहे
और चल रहे हैं ,
इसे कुछ फहमी में
खुश हो जाने का बहाना मत समझ ,
बस कुछ और जी लेने का
रास्ता बनाते चल ,
मंजिल देख तेरी कामयाबी का
रास्ता देख रही है ,
विश्वास देने वाले
बहुत मिल जायेंगें मगर,
पर यह अहसास तुम्हे
अपने अन्दर ही उत्सर्जित करना है ,
अगर तुम्हे मंजिल को पाना है ,
फिर कह रहा हूँ
सम्बन्धों की खुशफहमी में
नहीं रहना ऐ मेरे दोस्त ,
चलती जिन्दंगी में यहाँ
हर कोई अकेला है