Powered By Blogger

Saturday, August 18, 2012

नीरो की बांसुरी दिल्ली में नहीं बजेगी , जागो पीएम् साहब ...



तीन घोटाले और तीन लाख करोड़ रूपए यह कोई बच्चों को बहलाने का झुनझुना नहीं है कि आप इसे मामूली में उड़ा दें . श्री प्रकाश जायसवाल  जिस तरह प्रवचन की मुद्रा में मीडिया से बात कर रहे थे लगता था वह भारतीय मीडिया को बचकाना समझते हैं जिसे अपने तर्कों के झुनझुने से  बहला लेंगें. कैग का काम उन अनियमितताओं और गलतियों को परखना  और उसकी समीक्षात्मक व्याख्या, विश्लेषण करना है सो उसने किया है . अब सरकार जिसके भीतर और बाहर व्यवस्था के भिन्न भिन्न गठित संस्थाएं  है वे कोई निजी कृत्य नहीं कर रहीं  हैं और न ही वे मनमानी चलाने और लोकतान्त्रिक सरकार को चुनौती देने का उपक्रम है . लेकिन सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं कैग की गणनाएं गुमराह करने वाली और गलत है और लगे हाथ उसे चेता भी दिया है कि कैग अपने दायरे को लांघ रही है .

क्या महालेखानियन्त्रक  का काम इतना गुमराह करने वाला हो सकता है कि कोयले के खदानों की आवंटन प्रक्रियाओं को भी न समझ सके . कैग ने जब कहा है कि ५७ ब्लोक के आवंटन में प्रक्रिया का नियमानुकूल पालन नहीं हुआ है तो यह बहुत ही सिम्पल और सीधी व्याख्या है लेकिन इसके विश्लेषण से मालूम पड़ता है कि इस चूक से जो जानकार की गयी होगी उससे देश का एक लाख ८६ हज़ार करोड़ रूपया निजी पावर कम्पनियों को सीधे मुनाफ़ा दे गया है तो चौकना लाज़मी है और पड़ताल भी जरुरी है .लेकिन सरकार झुनझुना बजा रही है जैसे रोम जल रहा है और नीरो बांसुरी बजा रहा है . 

सरकार कि यह झुन्झुनाई बांसुरी इतना झकझोर रही है कि आज रोज़ रोज़ बड़े घोटालों की ख़बरों से जनता का रोम -रोम  जल रहा है ...लोग हतप्रभ हैं कि उनका पैसा उनके देश के काम नहीं आ रहा है  उनके चुने हुए चंद लोगों के हाथों ही लुटाया जा रहा है .कोयले में १.८६ लाख करोड़ . विमानन में ८८.३३  हज़ार करोड़ और पॉवर में २९ हज़ार करोड़  के बाद   २ जी स्पेक्ट्रम और कामन वेल्थ गेम्स को इन घोटालों के आगे भूल जाना बेहतर है .   2जी स्पेक्ट्रम में १.७६ लाख करोड़ ,कामन वेल्थ में ७० हज़ार करोड़ , तेलगी स्टेम्प में २० हज़ार करोड़ , सत्यम कंप्यूटर  में १४ हज़ार करोड़, चारा घोटाले में ९०० करोड़ के अलावा हवाला,आय पी एल,स्टोक मार्केट स्केम घोटालों  की ऐसी लम्बी फेहरिस्त  है जो सरकार की नज़रों में बेबुनियाद है या कोई ख़ास बात नहीं है . देश से ज्यादा पैसा देश के मलाईदारों के पास जा रहा है . 

ये मलाईदार कौन है , टाटा, अम्बानी,जिंदल जैसे तमाम लोग जो देश की अर्थ व्यवस्था के बड़े हिस्सेदार माने जाते हैं और इज्ज़तदार हैं , इनके  पैसे से हो रहे विकास का आम आदमी कर्ज़दार है लेकिन अब क्या ये ही  लोग देश को और देश के लोगों को चूस रहे हैं ऐसा जो आ रहा है ख़बरों  में दिख रहा है और संवैधानिक संस्थाओं  के सवालों के भीतर दिखाई दे रहा है वह देश के नामचीन बड़े लोगों को नज़रों से झुका रहा है इसलिए यह वक्त शर्म करने का है . बढता हुआ बरगद ऊँचा और अच्छा दिखाई देता है लेकिन वह आसपास की जमीं की उपज खा जाता है . आज देश में यही हो रहा है ऊँचे लोग देश को खाने में लगे हैं और  बेईमानी से नीचा काम कर रहे हैं . 

बड़े लोगों  की बेईमानी में भी ईमान होता है वे ईमान के रास्ते बेईमानी का रास्ता छुपे छुपे  पार कर लेते हैं और कुछ पता ही नहीं चलता , अपने लिहाज़ से सब कुछ तैयार करवा लेते हैं बदलवा देते है और साफ़ चट दिखाई देते हैं  सरकार के नुमाईन्दे इनके दलाल की तरह काम कर रहे होते हैं आज देश इन्हीं दलालों के हाथों में है कौन पकड़ेगा इन्हें और कैसे पकड़ेगा , जब सारी बेईमानी विधि से की जाए चाहे वह वैधानिक न हो पर बचे रहने का रास्ता बना देती है .

श्रीप्रकाश जायसवाल ने जता दिया है कि कुछ नहीं है सब गुमराह की  बातें है तो मान लो अब कुछ होना नहीं है जहाँ तक दलाली बंट सकती है बंट जायेगी और सब चुप हो जायेंगें . विपक्ष से भी उम्मीद ज्यादा मत करिए . साफ़ खरे दिखाई देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह से एक सवाल तो फिर भी है कि यदि आपको कुछ गलत दीख रहा है तो आप सीट पर क्यों बने हुए हैं ... लालबहादुर शस्त्री ही क्यों इस समय याद किये जाते हैं जो महज एक रेल दुर्घटना पर पद छोड़ देते हैं यहाँ खरबों के घोटालों की  घटना पर भी आप बने रहते है तो संशय तोडिये और अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित रखने के लिए ही यह तथ्य बता दीजिये  कि घोटाले है ही नहीं . क्योंकि पीएम् साहब कैग के  पीएम् ( पोस्टमार्टम ) में आप भी हैं ....और जरुरी यही है कि नीरो की बांसुरी दिल्ली में नहीं बजेगी न जनता का रोम जलेगा  इसलिए जागो .....!!
surendra bansal

Sunday, August 12, 2012

पूर्वोत्तर से पश्चिम साजिश की हवा



असम के नस्ली दंगों का असर फैलाव लेने लगा है . मुंबई जैसे अति व्यस्त शहर में शनिवार को हुई हिंसक घटना ने इसके चिंताजनक संकेत दे दिए हैं . जाहिर है नस्ली बैरभाव अब पूर्वोत्तर से चलकर पश्चिम की तरफ आता दिख रहा है . मुंबई में हिंसा के अभी तो यही अर्थ नज़र आ रहे हैं क्या कोकराझाड की प्रतिहिंसा की कोई  सुनियोजित  साज़िश है ?

मुंबई में जो घटा वह प्रतिहिंसा का ऐसा प्रतीक है जो साज़िश की ओर इशारा कर रहा है लगता है समाज विरोधी तत्व अपने गैर सामाजिक इरादों की योजना पर काम कर रहें हैं .आखिर असम की हिंसा का असर मुंबई में ही क्यों हुआ , यह बंगाल में होता तो समझ में आता लेकिन पूर्वोत्तर से हज़ारों किलोमीटर चल कर जो गुस्सा दिख रहा है वह किसी साज़िश की पूर्व तैयारी का रिहर्सल भी हो सकता  है. 

मुंबई के आज़ाद मैदान पर असम के मुद्दे पर हज़ारों लोगो का एकत्र होना यह दिखलाता है  कि आयोजक रज़ा अकेडमी ने नस्ली हिंसा के प्रतिरोध की आड़ में भावनाओं को भड़काने का सुनियोजित काम किया है . आखिर किसी भाषण की उत्तेजना इस कदर क्यों फैली कि लोग यकायक हिंसक हो गए ,आगजनी को उतारू हो गए .इससे ज्यादा यह कि लोगों ने उनकी व्यवस्था में लगी पुलिस को ही निशाना बनाया और उन्हें चुनचुन कर मारा .

दो लोगों की मौत और बीसियों के घायल होने  का जिम्मेदार कौन है, जो बुरी तरह घायल हुए है उसकी किन पर जिम्मेदारी है .यह पड़ताल ही नहीं उन्हें सज़ा सुनाने का वक़्त  है. सरकार यह नहीं कर सकी तो मुंबई  जैसा विशाल और देश की शान समझे जाने वाला शहर  आपसी वैमनस्य , कट्टर दुश्मनी और खुराफातियों की नित करतूतों की तरफ अग्रसर हो जाएगा . मीडिया भी घटना की निशाना बनी और उसे असम की घटना का दोषी बताकर लोगो को उकसाया गया .

मुंबई की आग उस तरफ भी इशारा करती है कि क्या कुछ ऐसे तत्व मुंबई में आगे बढ़ रहे हैं जो हिंसा के लिए तैयार हैं . इनमें  इतनी हिंसक भावनाएं क्यों बढ़ रही है , क्या तैयारी  है और कौन लोग इन्हें बढ़ावा दे रहे हैं . यह भी पड़ताल किया जाना चाहिए कि कोकरझाड की घटना को एक समुदाय विशेष में कौन लोग बढ़ा रहे हैं और  किस तरह भड़का रहें हैं . समय रहते महाराष्ट्र शासन को सचेत होना चाहिए यह एक खतरनाक  तैयारी का संकेत है .इसका पूर्वोत्तर से पश्चिम  में आना आग में घी का ऐसा काम करना है जिसकी नीयत सामाजिक भाव और आपसी सौहाद्रता को भस्म करना है .इसे सिर्फ साजिश की हवा ही कहा जा सकता है जो पश्चिम में मुंबई तक आ गयी है .

Sunday, August 5, 2012

स्वागतम अन्ना !

स्वागतम अन्ना ! 
देश इन दिनों इस बात की बहस में पड़ा है कि अन्ना हजारे व्यापक जन समर्थन के बाद राजनीति में क्यों उतर रहे हैं ? एक नया विचार देश के सामने आया है तो इसका मूल्यांकन होना ही चाहिए. लेकिन इसे जिस तरफ और जैसे बढाया जा रहा है  वह ठीक नहीं है . अन्ना की हर हरकत से पेट में उन लोगों को मरोड़े आती रही है जिन्हें अन्ना के आन्दोलन का प्रत्यक्ष सामना करना पड़ा है . ऐसे लोग और इनके लोग आज देश में इस बात का माहौल तैयार कर रहे हैं मानो अन्ना ने राजनीति में आने का फैसला कर  कोई बड़ा अपराध कर दिया हो .

लोकशाही की सबसे बड़ी  ताकत और उसे संचालित रखने का सबसे बड़ा कृत्य राजनीति ही है . स्वस्थ राजनैतिक विचार देश को स्वस्थ और खुशहाल रखते हैं .राजनीति सिध्दांतों और विचारो के अनुरूप चलाई जाने वाली ऐसी प्रतिद्वंदिता है जो अपनी नीति के अनुरूप राष्ट्र को विकसित ,प्रतिष्ठित और सुरक्षित  रखने का राज़-यत्न करती है और जब ऐसे विचारों और मूल्यों  के लोग सामूहिक हो जाते हैं तो वह एक संस्था बन जाती है ,यही संस्था  राजनैतिक दल कहलाती है .

किसी आन्दोलन और अनशन को राजनीति से अलग  रखना बेमानी है , हर आन्दोलन राजनीति  का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिस्सा होते हैं . क्योंकि जब कोई गैर राजनैतिक आन्दोलन आप कर रहे होते हैं तब भी आप राजनीति को प्रभावित करते हैं .लोकतंत्र में राजनीति को प्रभावित किये बिना कोई नीति बन नहीं सकती . अन्ना हजारे और उनकी टीम यही चाहती थी कि राजनीति इतनी प्रभावित हो कि देश की राजनीति की दिशा पलटे और राष्ट्र फिर एक नई दिशा से उन्नत होकर आगे बढ़े . राष्ट्र का सबसे बढ़ा अवरोध इस समय इसके अंतर में समाहित व्यापक भ्रष्टाचार है . जन के लिए तैयार हुआ राज़ आज इसी भ्रष्ट आचरण से जन जन और राष्ट्र को खा रहा है . इसी मुद्दे को लेकर अन्ना हजारे और उनके साथी आगे बढ़े देश को एकत्र किया एक व्यापक माहौल तैयार किया तो उन्होंने क्या अपराध किया . लेकिन देश कि सरकार और राजनीति ने इसे अपराध माना और इस व्यापक जन मुद्दे के साथ बड़े स्तर पर राजनीति की गयी . जो लोग साथ थे  उन्होंने भी और जो खफा थे उन्होंने ने भी कुटिल राजनीति कर आन्दोलन को ख़त्म करने का पूरा प्रयास किया . संसद के भीतर कैसे लोग हैं इसे जब अन्ना के लोगों ने मुद्दा बनाया तो सभी राजनैतिक लोग भड़के . लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि हाँ ऐसे लोग संसद के भीतर हैं जो संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाते है . ऐसे लोगो पर चल रही राजनीति ने ही कहा कि चुने हुए लोगों के बारे में ऐसा कहाँ लोकतंत्र और संसद का अपमान है . लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि इन लोगो को राजनीति में लाने कि हमने गलती की  है और हम अब राजनैतिक शुचिता को बनाने का यत्न करेंगें . दरअसल इतनी हिम्मत देश की राजनीति में बची नहीं है इसलिए राजनीति में शुद्धता ,स्वस्थता ,नैतिकता और वैचारिकता ही नहीं है और जब तक राजनीति के ये शुध्द तत्व नहीं होंगें राजनीति न बदलेगी और न देश बदलेगा .  इन्हीं मुद्दों को लेकर अगर कोई राजनीति में आता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए 

अन्ना हजारे और उनके लोग अपने जमे हुए विश्वास की पूंजी पर राजनीति में आ रहे हैं उनके लिए चुनौतिया ज्यादा है ,और समय भी कम है  यदि वे सफल हो गए तो देश कि राजनीति नए मोड़ पर होगी और खुद फिसल गए तो हमेशा के लिए वे  उनके सारे रस्ते बंद हो जायेंगें . खुले दिमाग खुली सोच और पक्के इरादे से उन्हें आगे बढ़ना होगा उनकी संख्या संसद के भीतर भले कम हो लेकिन पक्के इरादे और नीतिगत लोग यदि संसद के भीतर दिखने लगेंगें तो यह देश की राजनीति के लिए और लोकतंत्र के लिए नई सुबह होगी . इसे जीवंत रखना होगा रष्ट्र के भले के लिए इसलिए फिलवक्त सभी को कहना  चाहिए स्वागतम अन्ना !

Sunday, July 29, 2012

अपना रास और अपना व्दंव्द



म.प्र. विधानसभा ने उन दो विधायकों को फिर बहाल कर दिया जिन्हें आसंदी के प्रति बदसलूकी के आरोप में बर्खास्त कर दिया था , यह करते हुए विधानसभा ने दावा किया कि उसने ऐसा नैतिक काम किया है जो अब से पहले कभी नहीं हुआ और इससे एक  एतिहासिक परम्परा की  शुरुआत हुई है . लेकिन  विधानसभा के भीतर जो  कुछ हुआ क्या  वह एतिहासिक है .यह सवाल संवैधानिकता के साथ नैतिक मूल्यों के अलग मायने भी खड़े कर रहा है .

दरअसल  विधानसभा  के भीतर जो कुछ घटित हुआ था वह एक राजनैतिक प्रतिद्वंदिता थी परिणाम  स्वरुप बिगड़ते मामले में सर्वसम्मिति  से दो विधायकों की बर्खास्तगी हो गयी और बाद में जो कुछ हुआ वह एक राजनैतिक समझौता था ऐसा समझौता  जो कुछ गलतियों के अहसास से निर्मित किया  था और दोनों पक्षों ने उसे मान्य भी किया इससे बहाली की सर्वसम्मति भी निर्मित हुई अब इसे एतिहासिक माना जा रहा और इसे स्वस्थ परम्परा  की शुरुआत भी कहा जा रहा है . स्वस्थ और सहज परंपरा तो वह होती है जो संवैधानिक संस्था और उसके संचालन के लिए प्रतिस्थापित आसंदी के निर्मित मूल्यों का प्रतिपालन करे . हमारे सम्मानित सदस्यों ने ऐसा किया होता तो बर्खास्तगी होती ही नहीं . यदि बर्खास्तगी हुई है तो जाहिर है आसंदी और संवैधानिक मूल्यों का अपमान हुआ है . यदि  ऐसा नहीं हुआ तो सर्वसम्मति से बर्खास्तगी क्यों की गयी .उस आचरण का क्या हुआ जिसे असंसदीय और अमर्यादित माना गया था .क्या ऐसा था यह सवाल अब पूछा जाना चाहिए .

क्यों यह सवाल खड़ा हुआ है ? इसलिए कि संवैधानिक संस्था की मर्यादा आपकी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता और समझौते का कारक नहीं हो सकती. बर्खास्तगी और बहाली से सवैधानिक मर्यादा की  पुनर्स्थापना नहीं हो जाती  और न ही स्थापित प्रक्रियाओं का पालन हो जाता है. इसके लिए विशेष सत्र बुलाकर  पांच मिनट में सदस्यों के पुन; बहाली करना जनता का पैसे की सर्वथा बर्बादी है . जितनी जल्दबाजी में सदस्य बर्खास्त किये गए उतनी ही जल्दबाजी  में उनकी बहाली की गयी . दरअसल ये सदस्य निलंबित किये जा सकते थे लेकिन प्रतिद्वंदिता की भावना से ही सदन के भीतर राजनैतिक रोष उत्पन्न हुआ और जल्दबाजी में सदस्यों को बर्खास्त किया गया यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने उनकी सदस्यता शून्य मानते हुए विधानसभा सीट रिक्त मान ली. उखड़े हुए सदस्य माफीनामा देने को तैयार हो गए और समूची विधानसभा ने ताबड़तोड़ खास बुलाए  सत्र में सर्वसम्मति से बर्ख़ास्तगी  से बहाली मान्य कर ली . जब दो सर्वसम्मति के बीच बड़े निर्णय होते है तो माना जाना चाहिए कि यह प्रतिद्वान्दिक  विरोध और समझौता है .

प्रदेश के सी एम् शिवराजसिंह ने इसे राजनैतिक वा मानने से इंकार किया है यह राजनैतिक था भी नहीं यदि आचरण दोनों पक्षों का अपने अपने स्टेंड पर बना रहता क्योंकि वैधानिक मर्यादा और आसंदी के प्रति आचरण की वस्तु परिवर्तित नहीं की जा सकती, उसकी दृष्टि  नहीं बदली जा सकती  और उसके अपने मायने भी नहीं बनाये जा सकते , लेकिन हमारी विधानसभा के भीतर ऐसा हुआ है यह न स्वस्थता है , न पारंपरिक बाध्यता है और न ही एतिहासिक है .यह हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों के अपने मायने , अपनी दृष्टि ,अपनी वस्तु अपना निर्णय है इसलिए कोई इसे माने  या ना माने यह राजनैतिक प्रतिद्वंदिता और राजनैतिक समझौते की  ही उपज है .यह  इनका  अपना  रास  और  अपना  व्दंव्द है . 
सुरेन्द्र बंसल

Sunday, July 22, 2012

राष्ट्र -पद की सर्वोच्चता


प्रणब  दा रायसीना हिल्स पर चढ़ कर देश के उस शिखर पर पहुँच गए जहाँ से समुचा देश उन्हें अब उठी हुई नज़रों से देखेगा ऐसा इसलिए कि इससे बड़ी  जगह और सम्मान कोई नहीं है . अपने राजनैतिक जीवन  का तप और जप को प्रतिफलित होते वे देख रहे हैं दरअसल राष्ट्रपति पद ऐसे ही तपे हुए लोगों के लिए हो तो लगता है देश ने उन्हें पलट कर उपहार दिया है .विवाद तो हर किसी के जीवन में हैं और व्यक्ति जब सार्वजनिक होता है  तब बहुत सी उंगलियाँ उस तरफ से आती है जो आपको अपनी सजग जिम्मेदारी पर बने रहने की चेतावनियाँ  देती हैं .हो सकता है ऐसा बहुत कुछ प्रणब दा के साथ भी हो पर वे एक कुशल राजनीतिज्ञ और कर्मठ नेता रहें हैं इसलिए आज हम कह सकते हैं यह निर्वाचन योग्यता  की पदस्थापना है.

यूपीए  जो बेहतर दे सकता था वही उसने किया है हालाँकि पूर्णो संगमा भी उतने ही सशक्त थे और अच्छा यह था कि दोनों ही राजनीतिज्ञ थे , इस बार निर्वाचन बेहतर ही होना था और वोटिंग मूल्यों के आधार पर प्रणब दा का मूल्याँकन अधिक था और वे निर्वाचित हो गए . लेकिन यह परंपरा बनना चाहिए की राष्ट्रपति पद जैसे सर्वोच्च पद पर राजनैतिज्ञ व्यक्ति का तप सामने आये जो उसने  सम्पूर्ण राजनैतिक जीवन में खप कर तैयार किया है . राष्ट्रपति होना किसी राजनीतिज्ञ के लिए राष्ट्र की राजनीति से प्रदत्त वह अलंकरण है जो लोकतंत्र के मूल्यों को और अधिक   मज़बूत करता है .

बीते एक दशक में राजनीति जितनी गन्दला गई है उससे यह संशय होने लगा है कि राजनीति अब देश का विशेष नहीं अवशेष होते जा रही है . अच्छे  लोग राजनीति में बचेंगें ही नहीं तो तब इन महत्वपूर्ण पदों पर कौन स्थापित होगा और क्या तब लोकतंत्र की  ऐसी स्थिति हो जाएगी कि लोक के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचेगा . यह बहुत चिंतनीय विषय है आखिर लोकतंत्र मजबूरी से चलने वाला तंत्र नहीं होना चाहिए इसकी सशक्त व्यवस्थाएं इसे मजबूत और कारगर बनाने की है और यह तंत्र इन्हीं व्यवस्थाओं के अनुरूप चले इसकी जिम्मेदारी हर राजनीतिज्ञ की है .कैसे हो राजनितिक प्रदूषण  से मुक्ति  इसके प्रयास राष्ट्रपति निर्वाचन के साथ ही शुरू हो जाना चाहिए . अब वक़्त सिर्फ प्रतिस्पर्धात्मक  राजनीति का ही  नहीं स्वस्थ और राष्ट्रानुरूप व्यवस्थाओं के प्रतिमान बनाने का भी है .

दरअसल राज़ करने के उपाय बनाते हुए हर राजनैतिक दल आज अपनी उपस्थिति को सैध्दांतिक नहीं रखते  हुए समझौते और शर्तों  के आधार पर चला रहे हैं यह परिस्थिति बना दी  गयी है जो राजनैतिक विकेंद्रीकरण हम देख रहे है वह लोकतंत्र की बेहतरी का नहीं सत्ता में  बने रहने का है .इसलिए चिंता और चिंतन दोनों जरुरी है . राजनीति से बिदाई के साथ प्रणब दा रायसीना हिल्स पर इन तमाम विषयों पर चिंतन कर सकते हैं और अनौपचारिक चर्चा कर उन सभी से यह चिंता भी जाता सकते हैं की अब आखिर राजनीति कैसे चले . राष्ट्रपति पद संवैधानिक पद है जहाँ राजनीति का कोई स्थान नहीं है , लेकिन राजनीति  इस देश के संविधान के संरक्षण और संचालन के लिए है  . चिंताएं राष्ट्रपति की भांति भले न कर सके एक लोकपति की भांति कर अपनी नेक अहमियत से कुछ शुधि का प्रयास तो किया ही जा सकता है .यह पद  सिर्फ बड़े बह्वन में रहने और वैदेशिक दौरों के इस  आनंद का ही नहीं है यह प्रणब दा अच्छा समझते हैं और इस पद से राष्ट्र की सर्वोच्चता कैसे बनी रहे यह चिंता जरुर होना चाहिए आखिर यह सर्वोच्च राष्ट्र-पद है.
सुरेन्द्र बंसल 
blogspot.com/anna ka sapna sabka apna

Sunday, July 8, 2012

सयानी सीबीआई क्यों गच्चा खा गयी


सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के मामले में तो टूक फैसला दिया है , यह फैसला मायावती को कोई क्लीन चिट नहीं देता लेकिन सीबीआई के कामकाज और तौर तरीकों पर गहरे प्रश्नचिंह लगाता है. मायावती प्रसन्न है उनके समर्थकों की दी सम्पति जैसे मान्य हो गयी लेकिन कोर्ट ने कहा है उनके आदेश में आय से अधिक सम्पति का कोई मामला था ही नहीं जिस पर मामला दर्ज करने का आदेश दिया हो . दरअसल कोर्ट ने ताज कोरिडोर मामले पर प्राथमिकी दर्ज करने को कहा था और सीबी आई ने आय से ज्यादा सम्पति का मामला दर्ज कर लिया .

जाहिर है सीबीआई मनमाने ढंग से काम करने का आदी हो गया है .यह हद है कि देश के सबसे बड़े कोर्ट के आदेश को भी समझे बिना या उसके भिन्न अर्थ लगा कर सीबीआई अपने ढंग से केस तैयार कर लेती है . सीबीआई पर पहले से यह तोहमत है कि वह दवाब में और राजनैतिक उदेश्यों के अनुसार काम करती है .लेकिन कोर्ट के आदेश को समझे बिना उसे आधार बनाकर किसी मामले को दर्ज कर लेना ऐसी ना समझी है जो राष्ट्र के बड़े महकमे द्वारा की गयी है . वह भी ऐसा महकमा जिसकी जिम्मेदारी राष्ट्र को व्यवस्थित और नियमानुकूल चलने देने के लिए निगरानी करने और जिम्मेदार लोगो को दण्डित करवाने की तैयारी करने की है . अदालत ने जैसी लताड़ सीबीआई को लगायी है उससे इस बड़े विभाग के अर्थ पर ही सवालिया लग गया है . राजनीति तौर पर काम करने की पहले ही सीबीआई को बदनामी मिली हुई है अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के मामले में फैसला दे दिया है इससे सीबीआई के लिए शर्मिंदगी के अलावा कुछ नहीं बचा है .

ताज कोरिडोर मामले में मायावती भले न बची हो लेकिन वह अब आय से ज्यादा सम्पति एकत्र करने की बदनामी से साफ़ बच गयी है , आयकर का न्यायधिकरण जब यह कह चूका था कि उनकी सम्पति आय से ज्यादा नहीं है और यह उनके समर्थकों की दी हुई है तो सीबीआई किस तरह इस मामले को इस अंजाम तक ले गयी . बसपा के लोग जश्न माना रहे है , आखिर क्यों न मनाये जश्न. उनकी नेता को इससे मसले से कई लाभ एक साथ हुए हैं . एक- अब आय से ज्यादा सम्पति का मामला लगभग ख़त्म , दो - अब तक लग रहे कई गंभीर आरोपों से भी कुछ छुटकारा तीन - कम से कम सीबीआई अब कुछ लचीला और नरम रवैया रखेगी चार- इस फैसले का उपयोग अपनी छवि साफ़ बताने के लिए उपयोग किया जा सकेगा . इस तरह मायवती बहुत से शिकंजों से स्वत:बाहर आती दिखायी दे रही है .

मायावती के मामले में सीबीआई का भले राजनैतिक इस्तेमाल नहीं हुआ हो लेकिन सीबीआई ने दिखा दिया कि उसके यहाँ बहुत सी ऐसी लेतलालियाँ हैं जो सीबीआई के कामकाज को पक्षपातों से भरा दिखलाती हैं .जहाँ सरकारी हुक्मरानों के बड़े अफसर बैठते हों वहां इस तरह की गलतियां तात्कालिक नहीं होती साजिश और जानकर की गयी भी हो सकती है. सीबीआई इसलिए बदनाम भी है और उसे स्वायत्त करने की मांग भी इन्हीं कारणों से जबतब उठती रही है. देखना है इस मामले को महज़ एक गलती की तरह लिया जाता है या इस भद के लिए जिम्मेदार लोगों पर कोई कारवाई भी होगी ? आखिर सयानी सीबीआई कैसे गच्चा खा गयी और उससे यह गलती क्यों हुई ?


सुरेन्द्र बंसल


surendra.bansal77@gmail.com


Sunday, July 1, 2012

एक शहर का मृत हो जाना




इंदौर म.प्र. का एक जिंदादिल शहर है ( था ) . सुकून की वादियाँ इस शहर से ही खुशनुमा वातावरण का प्रसारण करती रही है .यूँ तो मालवा की शामें जग प्रसिद्ध हैं लेकिन इस शहर के जिंदादिल लोग और आतिथ्य - अपनत्व के संस्कार वाले लोग देश में कहीं और नहीं हैं . आज इस शहर पर हैवानों और दरिंदों का राज़ है . चार साल की मासूम शिवानी की जिंदगी छीन लेने वाले अपराधियों से यह शहर अब अटा पड़ा है . रोज़ एक से अनेक ख़बरें गेंग रेप , अपहरण . हत्या .बलवा . लूट , चोरी , डकैती की आ रही है  , क्रिमिनल पेनल कोड में उल्लेखित शायद ही कोई ऐसा अपराध बचा हो जो इन दिनों इस शहर में नहीं हुआ हो.फिर भी किसी को भी शर्म नहीं है . एक सांस्कृतिक शहर मर रहा है ,संस्कार ख़त्म हो रहे हैं, असुरक्षा बढ़ रही है , भय और आतंक यहाँ की आबोहवा में समां गया है ,लेकिन कर्ता सो रहे हैं लोग चुप हैं और शहर की सांस्कृतिक चिता की अग्नि देख कर भी उद्वेलित नहीं हो रहे हैं , यह मेरे अपने शहर की मौत है .

जिम्मेदार लोग कौन हैं इस बात की भी किसी को चिंता नहीं है ,फिर जिम्मेदारी कौन निभाएगा . एक पुलिस के बड़े अफसर ने कह दिया है आपके घर के भीतर हम चौकसी नहीं कर सकते लेकिन घर के बाहर की चौकीदारी पूरी तरह से हो रही है ? फिर इतने  बड़े और जघन्य अपराध कैसे हो रहे हैं .जिस शहर में मासूमियत को खुले आम रौंध दिया जाए उस शहर के अफसरों को एक पल भी अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है , इन्हें अविलम्ब निलंबित किया जाना ही चाहिए ताकि एक सीख और जिम्मेदारी का अहसास बना रहे . 

यह एक व्यावसायिक शहर है .लेकिन यह शहर किसी की दुकान नहीं है आज सबसे ज्यादा शासनिक और प्रशासनिक दुकानदारी इंदौर में ही हो रही है , हर कोई यहाँ व्यवसाय कर रहा है , अन्ना के विशाल आन्दोलन के वावजूद भी . पूर्ववर्ती सरकारों के समय में भी इंदौर सबसे बड़ी दुकान था और आज भी बड़ी और बढती हुई दुकान इंदौर ही है . यहाँ के लोग तो पहले से ज्यादा व्यस्त हैं ही लेकिन जिम्मेदार तत्व महा व्यस्त और महा भ्रष्ट हैं इसमे अब कोई दो बात नहीं है. अफसरों में कौन नहीं है जो इंदौर का स्थायी नहीं है और इंदौर का जमाईं नहीं है . बीते दस -बीस वर्षों का रिकॉर्ड इमानदारी से खंगाला जाए तो सीबीआई को दस-बीस सालों तक इन मामलों से फुर्सत नहीं मिलेगी .

प्रशासनिक के साथ राजनीति भी इस शहर की एक बड़ी दुकान है . इसमें लोग नहीं है जो है या जो कुछ है वह सिर्फ पैसा है , यह बात बहुत कडवी है लेकिन इस शहर की  भी यह सच्चाई है , राजनीति में बहुत से गठजोड़ हैं जो दुकानों की तरह चलाये जा रहे हैं यह गठजोड़ किससे है यह बताने की जरुरत नहीं है लेकिन ये गठजोड़ असामाजिक और अनैतिक हैं.इन पर कोई आंच नहीं हैं और ये फलफूल रहे हैं चल रहें है विकसित हो रहे हैं पनप रहें है ,नए तैयार हो रहे हैं और शहर की प्रदेश की राजनीति की ऐसी भी कर रहे है तैसी भी कर रहे हैं.ख़ास यह है कि इनकी सफेदी और चमकार कायम है.किसी दल में कोई रोक नहीं है सब फलफूल रहे हैं सब राज़ करते हुए राजा हैं नीति की नैतिकता आज इस राजनीति का हिस्सा नहीं हैं. सोचने वालों के लिए यह शर्म है बेशर्म लोगों के लिए यह फिजूल है .

जाहिर है इन दुकानों के चलते शहर की मानवता मर गयी है अपराध बढ़ रहे है और बेशर्मी बढ़  रही है,अब यह मेरा वह शहर नहीं है उसकी मृत स्थिति में हम जी रहे हैं शर्म है तो मुझे अपने पर ,मैं याने एक नागरिक जिसने इतने निठ्ठले और निष्काम लोगों को बढने  पनपने दिया है