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Saturday, April 28, 2012

कल ही मैंने एक दर्द खरीद लिया है

लो खुश हो जाओ तुम भी
ऐ मेरे मित्र,
कल ही मैंने 
एक दर्द खरीद लिया है
इन पैसों से चाहता था 
कुछ  ले आऊँगा घर 
माटी, कंकर ,घासफूस ,
तिनके ,टुकड़े ,लकड़ी ,पत्थर 
रखकर टीला बना लूँगा 
चढ़ जाऊँगा उस पर तन कर 
कुछ उंचा उठ जाऊँगा
रुक गया यहीं पर 
थाम लिया अपने को 
अपने के भीतर 
थम जाओ सुरेन्द्र तुम 
अब यहीं   तक 
दूसरे को लिए जिते रहे
 हो  अब तक
उन्हें खुश ही रहने दो 
बढ़ रही है ख़ुशी तुम्हे 
ऐ मुसाफिर 
घर लौटने के पहले ही 
एक दर्द खरीद लो
लो खुश हो जाओ 
ऐ मेरे मित्र तुम भी 
कल ही मैंने 
एक दर्द खरीद लिया है ..
-सुरेन्द्र बंसल   
21 APRIL12

Saturday, April 21, 2012

मोहर सरकार की लुंजपुंजता पर...


खास आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने सीधे और सपाट लफ्जों में कटु सत्य कहा था कि भ्रष्टाचार और घपले भारत के आर्थिक विकास में बाधक है और अगले चुनाव तक आर्थिक विकास की दशा सुधरने की संभावना नहीं है . जाहिर है सत्य की चुभन तेज़ होती है सो इसका अंदाज़ प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की उस साफगोई में दिखा जिसमें उन्होंने नौकरशाहों को हिदायत दी कि वे सख्ती  से काम ले.
बातें दोनों ही अपनी जगह सही और सटीक है लेकिन ये इस तथ्य को भी जाहिर करते हैं कि  सरकार के भीतर कामकाज और वातावरण ठीक नहीं है . सरकार बैठी नहीं चलती रहना चाहिए . नौकरशाहों में श्री बसु का प्रतिनिधित्व बयान माने तो यह साफ़ लगता है कि चुने हुए लोग और राष्ट्र की धारा को प्रभावित करने वाले तत्व भ्रष्टाचार और घोटाले से राष्ट्र का बे-इन्तहा नुकसान कर रहे हैं . श्री बसु ने यह वाशिंगटन की एक संस्था के कार्यक्रम में कहे इसलिए उनके बयान का महत्व और असर अंतर्राष्ट्रीय है . जब बातें चल निकलती है  तब उसका आकलन तथ्यात्मकता के परिप्रेक्ष्य में होने लगता है और इशारों ही इशारों में बड़ी बड़ी बातें सामने आ जाती है .
चूँकि श्री बसु सरकार के भीतर बड़े प्रशासनिक ओहदे पर हैं तो बात का फैलाव ज्यादा और प्रमाणिकता भी ज्यादा नज़र आने लगी लिहाजा सरकार पर प्रश्नचिन्ह इस बात का है कि क्या यह विश्वसनीय सरकार है? दरअसल श्री बसु के बयान से ऐसे कटघरे का निर्माण हो गया जिसके अंदर ऐसे लोग अनायास आ गए हैं जो सरकार चलाने के लिए जिम्मेदार हैं .इसलिए भ्रष्टाचार और घोटाले की जिम्मेदारी कहीं नज़र आई तो वह भी नौकरशाहों से अलग उन प्रतिनिधियों पर आई जो प्रजातंत्र में चुने हुए लोग हैं.लिहाज़ा इस अनपेक्षित आक्रमण पर सबसे पहले जरुरत विश्वसनीयता  बचाने की होना चाहिए थी इसके लिए प्रधानमंत्री से बेहतर और कोई नहीं था , सो मनमोहनसिंह ने नकेल कसने के लिए कह दिया कि नौकरशाहों को सख्ती से काम लेना    चाहिए याने वे भ्रष्टाचार या किसी तरह का घपला देखते हैं या इस तरह कि किसी दखलंदाज़ी देखते हैं तो उन्हें सख्त होकर उससे निबटना चाहिए . प्रधानमंत्री स्वयं किसी समय एक बड़े ब्यूरोक्रेट रहे हैं और नौकरशाही किस तरह चलती है वे अछि तरह जानते हैं ऐसे में उनका बयान इसलिए महतवपूर्ण है कि किसी भी मसाले पर सम्बंधित विभागीय अफसर अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति देने का अधिकार रखते हैं यदि वह उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो भ्रष्टाचार और घोटाले जैसे काण्ड होते रहेंगें , प्रधानमंत्री अनुसार लगता है नौकरशाहों की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा है .
बहरहाल एक बात साफ़ है.भ्रष्टाचार और घपले राष्ट्र की विकास धारा को रोक रहे हैं और यह विचार कौशिक बसु के विचार से मेल खाता है फिर चाहे शासन के चुने हुए प्रतनिधियों के द्वारा हो रहा हो या नौकरशाहों की अनदेखी से . शासन और प्रशासन दोनों सरकार के ऐसे अंग हैं जो एक सम्पूर्ण सरकार का निर्माण करते हैं यदि दोनों ही जिम्मेदारी से काम नहीं कर रहे हैं जैसा इनके बयानों से लग रहा हैं तो जाहिर है गड़बड़ बड़ी है और राष्ट्र में एक लुंजपुंज सरकार चल रही है जो इस परिस्थितियों से नहीं निबट सके तो वह ढीली और बेअसर सरकार होती है . आज मोहर इस बात की लग गयी है इसलिए कि दोनों ही बयान दोतरफा गड़बड़ी का बड़ा संकेत डे रहें है .
सुरेन्द्र बंसल 
कॉपी राइट ;surendrabansal@blogspot.com

Thursday, April 19, 2012

कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ सांस उधार ले ले,


मौत अभी कुछ दूर है 


कुछ दुआ साथ ले ले


शांति का मरघट 


यूँ नहीं पास आएगा 


हो सके हाथ में 


कुछ  देर जाम ले ले 


देख कुछ  लोग पी पी कर मर रहे हैं 


हो सके तो तू भी 


कुछ देर इसका मज़ा ले ले 


कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ सांस उधार ले ले..
सुरेन्द्र बंसल

औरों के लिए . by Surendra Bansal on Wednesday, April 18, 2012 at 10:01pm ·


मैंने भी जिंदगी मैं उस चट्टान के पत्थर बीने हैं ,
जो कल तक तराशे गए कि काम  लायक थे 
नाकाम पत्थरों  को कौन उठाता है
न मंदिर बनाता है न कब्र , 
पत्थर बीनते बीनते 
चट्टान से इस तरह लुडक गया हूँ 
जैसे स्वयं पत्थर बन गया हूँ..

जिंदगी जब पथरा जाती है इस तरह 
संघर्ष टूट जाता है टूटते तारों की तरह 
तब कोई नहीं होता उस पत्थर का 
और वह फिर तराशा जाता है 
औरों के लिए ......

Saturday, March 31, 2012

सच देखकर आँखे मूंद लेना ईमानदारी नहीं है.



From: surendra bansal <surendra.bansal77@gmail.com>
जी आप मान सकते हैं हमारे रक्षा मंत्री ईमानदार हैं , हमारे सेनाध्यक्ष का बयान भी एक ईमानदार प्रयास है और देश में अब तक के एक सर्वाधिक ईमानदार प्रधानमंत्री काम कर ही रहे रहें .फिर भी देश में अब तक के सबसे बड़े घोटाले सामने इतने  ईमानदार लोगों के बीच ही आयें है , पता नहीं बहुतेरे ईमानदार लोगो के मध्य कुछेक बेईमान कैसे देश को पलीता लगा रहे हैं .रोज़ हजारों करोड़ के घोटाले सामने  आने की रफत जनता की बन गई है और वह सब सहते चली जा रही है . राजीव गाँधी महज़ ६५ करोड़ के बोफोर्स तोप घोटाले से सांसत में आ गये थे अब यह कथित घोटाला लगता है जीरे बराबर था , इतने छोटे घोटाले आयें तो शायद अब लोग घोटाला ही नहीं माने. यह भी हो सकता है छोटे मोटे घोटाले रोज़मर्रा की  तरह हो भी रहे हो और उन पर किसी का ध्यान जा ही नहीं रहा हो .
बहरहाल रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष कुछ विवाद के बाद देश हित में एक जुट दिखने लगे हैं . दरअसल यह घोटाला नहीं है यह घूस की  पेशकश है जो देश के सबसे बड़े रक्षा संस्थान के सुप्रीम को पेश की गयी थी . इसमे अब कोई यह विवाद नहीं है कि यह सच था या झूठ . क्योंकि अब यह तय हो चूका है कि ऐसा कुछ उन दिनों हुआ था जो रक्षा मंत्री समेत तमाम लोगों के बीच भी एक शिकायत के तौर पर आया था  जाहिर है सेनाध्यक्ष ने जो आरोप लगाया है उसकी सच्चाई से कई लोग वाकिफ हैं . मामला २००९ से चल रहा है .७०० टेट्रा ट्रक खरीदी के बदले सिर्फ सेनाध्यक्ष को ही १४ करोड़ रुपये बतौर घूस देने की  पेशकश मामूली नहीं थी यह रकम और भी ज्यादा हो सकती है यदि ऐसी ही पेशकश डील से जुड़े रहेने वाले अन्य पक्षों को भी की गयी हो , इसकी पड़ताल तो अभी हुई ही नहीं है और कहीं चर्चा भी नहीं है लेकिन किसी डील में कोई एक पक्ष ही नहीं रहता उसके अनेक स्तर होते है और लोबिस्ट सभी स्तर पर कोशिश और तैयारी  करते हैं दूसरे पक्ष अभी जाहिर नहीं हुए है हो सकता है घूस देने का मामला आने वाले दिनों में कुछ बढकर मालूम हो .
जो भी हो सेना के भीतर के  सर्वोच्च कक्ष से अत्यंत संवेदनशील खबर बाहर आई है. इससे चिंताएं बड़ी हैं और खबरदार  रहने की  भी अधिक जरुरत है . इसकी दो वजहें हैं - एक- अत्यंत गोपनीय संस्थान के भीतर ऐसे लोगो की पहुँच जो पैसे के बल पर कुछ भी खरीदने की हिम्मत रखते हैं , दो - ईमानदार लोग बेईमानों को देखकर और पहचानकर भी आँखें क्यों मूंदे रहते हैं ..ये दोनों ही वजहे बड़ी चिंता देने वाली है . पता नहीं कब से कितने लोग सेना के भीतर ऐसे प्रयास करते रहे होंगें और सवाल यह भी है कि  क्या बरास्ता खरीदारों के दुश्मन भी अंदर तक पहुंचे है  दूसरा ऐसी ईमानदारी  क्या काम की जब बेईमान आपके सर पर खड़े हों आप उन्हें पहचान रहे हों और फिर भी आप चुप और मौन हो इस खुशफहमी से कि  आप ईमानदार है . जो पक्ष जितने  भी घोटाले  हुए है या उसके प्रयास हुए है जानते हुए भी आँखे मूंदे रहे हैं उन्हें कैसे कहे कि वे ईमानदार है , सच देखकर आँखे मूंद लेना कहीं भी ईमानदारी नहीं है..
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JADU



-- 
JADU 

Tuesday, March 27, 2012

maa

बेखबर था इस बात से
माँ,
होली से पांच दिनों का रंग
इतना बुरा होगा ,
तेरे आँचल में खेलते हुए
बीते दिन हो जायेंगें भंग,
तूने ही तो कहा था जा
वृन्दावन बिहारीलाल ,
उसके चरणों में तूने अपना
शगुन भी भेजा था
माँ ,
यह कैसा अर्पण
और समपर्ण है
माँ ,
जिंदगी भर चाहत
और भर ममता से
रखा था साथ मुझको
माँ,
अपनी नज़रों से दूर
फिर क्यों जाने दिया ,
तेरे आंसुओं से शक
मुझे हुआ जरुर था
माँ,
कहीं तू न जाए थक
इस तरह मेरे पिछे
जाते जाते भी
तुझे मेरा ख्याल था शायद
मेरा नियम तुझे याद था
माँ,
इसलिए तूने
मुझे जाने भी दिया
बांकेबिहारी का दर्शन
पाने भी दिया
इंतज़ार में मेरे कष्ट
उठाती रही तू
माँ,
यम को तब तक पास
आने न दिया
पर क्यों मुझे
अपने चरणों में
बैठे रहने का फ़र्ज़
निभाने न दिया
माँ,
देख यह घर कितना
सुना सुना हो गया है
माँ,
तुझे साथ लाना था घर
लेकिन कुदरत ने तेरी तस्वीर
साथ भेज दी है
माँ,
तकदीर में जब तस्वीर होती है
माँ,
तेरे लिए मेरी आत्मा भी रोती है
माँ"..............
.........................
............................................
26march 12 

Sunday, March 4, 2012

किस मोड़ पर जायेगी राष्ट्र की धारा !


गंभीर आरोपों से केंद्र सरकार को झकझोरते हुए समयकाल के बीच पांच राज्यों में चल रहे चुनावी संग्राम का समापन हो गया , नतीजे मंगलवार को आने लगेगें . गोवा और मणिपुर ज्यादा चर्चित नहीं रहे , लेकिन पश्चिमोत्तर सीमा के पंजाब, उत्तराखंड,और उत्तरप्रदेश के चुनावी शोरगुल से पूरा देश दबा रहा , इस बीच हो हल्ले वाले विषय भी दब गए और बड़े बड़े घोटाले जाने कहाँ खो गए. वक़्त मीडिया के लिए और नेताओं के लिए भी चुनावी हो चला था और इस चुनाव में भ्रष्टाचार से बढकर जातिवाद , जोड़ तोड़ , बहुबल और धनबल ही था सो सबने इसी का इस्तेमाल किया और जोर लगाया .मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा 


भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में चले अभियान पर पनपे महा जन-रोष  के बाद हुए इस चुनाव में धारणा थी कि आक्रोश इतना फूट पडेगा कि राजनेताओं को भागना पड़ेगा और इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ना पड़ेगा . लेकिन ऐसा हुआ नहीं. खासकर उत्तरप्रदेश जैसे महा राज्य में जहाँ से राज्य के साथ साथ केंद्र की सरकार बनाने और बिगड़ने की संख्या ज्यादा है ,आखिर 85  सांसद उत्तरप्रदेश से चुने जाते हैं ऐसे में उत्तरप्रदेश का राजनैतिक महामहत्व है . और इसिलए मुद्दे वहां से उठे तो इसे राष्ट्रीय मुद्दे माना जाना चाहिए .


मुद्दे तो बनते है और लोग जब उससे जुड़ते जाते हैं तो ऐसे मुद्दे निर्णायक हो जाते है पहले भी बड़े आन्दोलन जब भी हुए उत्तरप्रदेश का उसमे योगदान रहा और उत्तरप्रदेश ने केंद्र और राज्य दोनों तरफ ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बे -बाक राय जाहिर करते हुए सत्ता परिवर्तन भी किया . इस बार ऐसा नहीं लगा कि अन्ना हजारे के विशाल जनांदोलन और आन्दोलन को मिले समर्थन के बाद यहाँ भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा बन गया हो.इसकी कहीं कोई ललक और लहर नहीं दिखी हालाँकि ६ मार्च दिखाएगा कि यह दिन चौकानेवाला है या नहीं , फिल वक़्त  ऐसी कोई खबर नहीं है . इसलिए यह चौकानेवाली बात है कि इस महा चुनाव में मुद्दे जो राष्ट्रीय धारा से उपज रहे थे वे आखिर  कहाँ खो गए लगते हैं .लोकतान्त्रिक राज़ में मुद्दों का खो जाना या उनका असरकारक नहीं बनना चिंता की बात है .


चिंता यह नहीं कि मुद्दे ये क्यों नहीं बने , चिंता का लोकतंत्र पर खतरा यह है कि मुद्दे वे बने जो लोक को एक कर तंत्र बनाने की इच्छा नहीं रखते वे लोक को बांटकर तंत्र का ख्वाब तैयार करते हैं . उत्तरप्रदेश में यही हुआ , जो बंटाओ हुआ वह जातिगत हुआ और वोट कबाडने की नीति भी सामाजिक बंटाओ के मुद्दे पर आधारित रही यही वजह रही कि राष्ट्रीय दल जिनमे कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी परतिया भी हैं उन्होंने इन्हीं मुद्दों पर अपने को क्षेत्रीय दलों में बंधित कर लिया और उन्ही आधार पर वहां चुनाव लड़ा ,यह सर्वाधिक चिंतनीय होना चाहिए , उत्तरप्रदेश में हर कोई लोगो को उसके जाति और जमात  के आधार पर बांटने में लगा रहा . ये चुनाव आखिर राष्ट्र की धारा को किस मोड़ पर ले जायेंगें .


सुरेन्द्र बंसल
 surendra.bansal77@gmail.com