Friday, April 26, 2013
Thursday, April 18, 2013
SURENDRA BANSAL kee Kalam se: आखिर अदा में भी कितने होते हैं प्राण.....
SURENDRA BANSAL kee Kalam se: आखिर अदा में भी कितने होते हैं प्राण.....: सिनेमा के सौ साल हो गए हैं और लगभग सौ साल के पास प्राण कृष्ण सिकंद (93) भी हैं जिन्हें अब बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार "...
Sunday, April 14, 2013
आखिर अदा में भी कितने होते हैं प्राण.....
सिनेमा के सौ साल हो गए हैं और लगभग सौ साल के पास प्राण कृष्ण सिकंद (93) भी हैं जिन्हें अब बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार " दादा साहब फाल्के अवार्ड" से नवाज़ा जायेगा , प्राण साहब वाकई बॉलीवुड के प्राण रहे जिस फिल्म में प्राण हो उसमे जान न हो ऐसा नहीं होता था ,इसलिए कीमत में यह खलनायक नायक से भी महंगा होता था . दरअसल जैसा उनका नाम रहा है वैसा उनका काम रहा है . फिलवक्त वे बीमार हैं लेकिन खुदा ने खैर रखी तो भारतीय सिनेमा का यह करिश्माई खलनायक अपने सिनेमाई जीवन के 100 साल भी पूरे कर लेंगें .
प्राण यूँ दिल्ली में एक फोटोग्राफर थे लेकिन तकदीर उन्हें जब मुंबई ले गयी तब उन्हें भी नहीं पता था कि वे बॉलीवुड सिनेमा में 400 फिल्मों में किरदार निभाने वाले नायक से भी बड़े खलनायक और चरित्र अभिनेता हो जायेंगें . फिल्मों में आज भी ट्रेंड नायक का है नायिका भी कभी नायक से ऊपर नहीं देखी गयी. लेकिन प्राण साहब के हुनर ने उन्हें नायक से बड़ा बना दिया . याद कीजिये बिग बी अमिताभ बच्चन की सर्वोत्कृष्ट फिल्मे ज़ंजीर ,डॉन ,शराबी और अमर अकबर एंथोनी में प्राण साहब की यादगार भूमिकाओं ने इन फिल्मों को हिट करने में बड़ा काम किया . हो भी क्यों नहीं, निर्माता और निर्देशक भी समझते थे कि प्राण साहब का होना ही फिल्म को हिट कर जाएगा इसिलए इन फिल्मों में प्राण को नायक से ज्यादा और कहीं कहीं दोगुना पैसा दिया गया . प्राण के किरदार फिल्मों के प्राण होते थे यह इसका सबूत है .
उपकार के मलंग चाचा और ज़ंजीर के दयालु शेर खान पठान को कौन भूल सकता है दोनों ही भूमिका में प्राण खलनायक से बेहतर चरित्र नायक बन गए . वैसे उन्होंने अपनी पहली फिल्म जिद्दी से ही बेहतर कलाकार होने की छाप बना ली थी .आजाद, मधुमती, देवदास, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, आदमी, मुनीम जी, अमरदीप, जब प्यार किसी से होता है, चोरी-चोरी, जागते रहो, छलिया, जिस देश में गंगा बहती है और उपकार फिल्मे जब बार बार देखने जाते थे तो प्राण की अदा उनके जेहन में होती थी और वे तब भी राजकपूर ,दिलीप कुमार और देवानंद से कमतर कभी नहीं रहे . नायक तो स्टार होता ही है उसकी भूमिका भी स्टार कास्ट की तरह ही फिल्माई जाती है लेकिन खलनायक तो समाज एक नकारात्मक पात्र होता है जिससे सभी घृणा करते है ऐसे किरदार को निभाना बहुत ही चुनौती का काम है , इन भूमिकाओं को करके यदि कलाकार यादगार हो जाता है तो यह उस कलाकार की महान कला का नतीजा है , समाज के नकारात्मक व्यक्ति को यदि समाज उसकी अदा के लिए याद रखे और सराहे तो उस कलाकार का यह सबसे बड़ा सम्मान है आज प्राण साहब उतनी ही इज्ज़त से देखें जा रहे है याद किये जा रहे है चाहे बरास्ता दादा साहब फाल्के अवार्ड से ही हो यह बेहद सम्मान की बात है , आखिरअदा में भी कितने प्राण होते हैं .
Sunday, April 7, 2013
राष्ट्र एक मज़बूत समानांतर राजनैतिक दल चाहता है
बीजेपी के 32 साल हो गए . जनता पार्टी से अलग होकर बनी बीजेपी आज भी उस मुकाम पर नहीं पहुंची है जहाँ से सबसे बड़ी राजनैतिक चुनौती कांग्रेस को मुश्किलों में डाल सके ,
इतने सालों में बीजेपी ने अपने को मज़बूत किया किया और कई राज्यों में राज़ के हालात बना लिए आज बीजेपी में पीएम के लिए चर्चाएँ है लेकिन पीएम कैसे बने कैसे इसे अंजाम मिले इसके लिए बीजेपी इन 32 सालों में भी तैयार नहीं हो सकी है हालाँकि 33 वां साल उसके लिए केंद्र में राज़ करने के सपने लेकर आया है .
बीजेपी अपने समय में जब भारतीय जनसंघ थी तब उसका दीपक कम टिमटिमाता था लेकिन तब भी वह एक वैचारिक द्रष्टिकोण वाली पार्टी थी और उसके फ़ालोवर तैयार हो रहे थे वहीँ से यह पार्टी काडर बेस वाली पार्टी बन गयी .फिर भी बीजेपी उन तमाम कोशिशों में नाकाम रही जिससे वह केंद्र में अपने बूते पर सरकार बनाने में कामयाब हो सके . जनता पार्टी के शासन के दौरान ही मिलीजुली सरकार याने गठबंधन सरकार बनाने का प्रचलन चला .हालाँकि पहले भी अंतरिम सरकार बनी थी और जनसंघ के नेता भी पंडित नेहरु की सरकार में तब मंत्री बने फिर भी इंदिरा गाँधी के समय इमरजेंसी के भोगियों में सारा देश ही था ,और रुष्ट था ऐसे में जब छोटी छोटी पार्टियाँ एकमत से विरोध में उठ बैठी तो वह परिवर्तन आ गया जिसे सपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण ने संजोया था . यह समय विरोध और रुष्टता का था लेकिन बाद में ताल मेल का समय आया तो सब गड़बड़ हो गया तालमेल के नाम पर मोलतोल होने लगे और हर क्षेत्रीय दलों ने अपना रुतबा अपने छोटे छोटे अंकों से ही दिखाना शुरू कर दिया .यह देश की राजनैतिक दिशा का परिवर्तन था .
बीजेपी ने इसे भांप लिया लेकिन इसके लिए उसने या तो कोई नीति नहीं बनायीं या वह अपनी नीतियों में कारगर नहीं हुई . हालाँकि अटलजी के नेतृत्व में एनडीए जैसा मज़बूत गठबंधन देश को मिला बाद में यूपीए ने भी इसी रास्ते पर चल कर सरकारे चला ली .होना यह चाहिए था कि बीजेपी अपने को इस लायक बना लेती कि संख्यात्मक रूप से वह पूरे देश में नज़र आती .
32 साल एक लम्बा समय है इतने सालों में बीजेपी अपने को समान्तर राजनैतिक दल तो बना लिया लेकिन विस्तृत प्रतिनिधित्व वाला दल वह नहीं बना सकी . यह समय बीजेपी के लिए इसी का होना चाहिए . आखिर तमाम कोशिशों के बाद भी बीजेपी अपने को पूर्वोत्तर से पश्चिमोत्तर तक और सदर्न रीजन के तमाम प्रान्तों तक एक सी पैठ क्यों नहीं बना सकी . यह 32 सालों में नहीं कर सके फिर कब और कैसे यह सम्भव होगा यह मंथन बीजेपी को करना चाहिए कि राष्ट्र एक मज़बूत समानांतर राजनैतिक दल चाहता है
सुरेन्द्र बंसल
Sunday, March 24, 2013
इन्साफ भी सही इंसान भी सही
संजय दत्त को गैर क़ानूनी तरह से हथियार रखने के अपराध में सुप्रीम कोर्ट ने ५ साल की सजा सुनाई है . जाहिर है संजय का अपराध सजा की उस श्रेणी में आता है जहाँ से उन्हें बरी नहीं किया जा सकता . न्यायिक प्रक्रिया में जो हो सकता था, जितना हो सकता था उस न्यायसंगत निर्णय का पालन करना एक कर्त्तव्य भी है . संजय दत्त स्वीकार भी कर रहे हैं लेकिन यह भी है १९९३ के अपराध के बाद संजय बदले हुए एक नेक इंसान भी नज़र आ रहे हैं इसलिए यह आवाज़ भी आ रही है कि क्यों न उन्हें माफ़ी दे दी जाए .
दरअसल इन्साफ को किसी व्यक्ति विशेष के लिए चुनौती देना ठीक नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया सभी नागरिकों के लिए एक समान है जिसकी सभी को इज्ज़त और मान करना है . व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण अंग है जिस पर तमाम व्यवस्थाओं को संतुलित ,नियंत्रित और मर्यादा में रखने की अपरोक्ष जिम्मेदारी है .न्याय प्रक्रिया देश के कानून को सुरक्षित और संवर्धित करती है , इसलिए इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है और न ही किसी तरह से कोई आरक्षित छूट किसी नागरिक को है , सबके लिए समान व्यवस्था और कानून है जिसका सबको पालन करना है . संजय दत्त भी यदि किसी अपराध की श्रेणी में हैं तो कानून उसके अंतर्गत सजा ही देगा कोई माफ़ी वह नहीं दे सकता . इसलिए संजय दत्त को ५ साल की कैद की सजा सुनाई गयी है.
लेकिन कई बार लगता है कि सजा ज्यादा हो रही है या न होती तो अच्छा होता ऐसा तब होता है जब किसी के आचरण के बारे में आपको पता हो ,उसका वर्तमान ठीक हो। संजय दत्त के लिए अब कई लोग ऐसा ही सोचते हैं .इन लोगों का का विचार है की संजय अब वो नहीं है वे एक नेक इंसान हैं इसलिए उन्हें २० साल पहले के अपराध के लिए माफ़ी दे दी जाना चाहिए . ऐसा सोचने वाले बॉलीवुड के लोग भी हैं और राजनेता भी.लोग जब यह सोचते हैं तो गलत भी नहीं . यदि किसी के आचरण के प्रति सार्वजनिक मान्यता इस तरह हो कि वह एक भला इंसान है तो सहानुभूति की बातें तो आयेंगी ही . संजय को ये सहानुभूति मिल रही है तो कुछ गलत भी नहीं है .
जाहिर है संजय दत्त के मामले में इन्साफ सही हुआ है और यह भी कि वे अब एक अच्छे इंसान हैं .यदि कहीं माफ़ी की बात होती है तो यह देखा जाना चाहिए कि कानून सम्मत दृष्टि से क्या उन्हें माफ़ किया जा सकता है . यदि ऐसी किसी प्रक्रिया में वे आते हैं तो यह पड़ताल की जाना चाहिए कि क्या वे वाकई माफ़ी के हकदार हैं , क्या उनका आचरण और कृत्य सामाजिक मूल्यों के अनुरूप है क्या वे वाकई अच्छे इंसान है इन सबकी बारीक पड़ताल किसी भी निर्णय पर पहुँचने के पहले करना चाहिए इसलिए भी कि इन्साफ भी सही है और इंसान भी सही है .
सुरेन्द्र बंसल 9826098307
Saturday, March 16, 2013
गुर्राने से काम नहीं चलेगा काट भी जरुरी है
पाक की संसद ने जिस तरह बेख़ौफ़ अफजल गुरु मसले पर प्रस्ताव पास किया है उसका उसी लहजे में हमने जवाब भी दिया है , हमारी संसद ने एकमत से पाकिस्तान का निंदा प्रस्ताव पास किया और उसे जताया कि हमारे निजी और अंदरूनी मामले में दखल का वह तनिक भी प्रयास न करे .यह अच्छी बात है कि संसद के भीतर मतभेदों की धमाचौकड़ी मचाने वाले हमारे सांसदों और राजनैतिक दलों ने पूरी ताकत से एकजुटता दिखा कर पाक की दादागिरी को उसी तेवर में जमीं दिखाई है . लेकिन क्या यह ऩा - काफी नहीं है अभी इस मसले को दूर तक ,अंतर तक और वृहदता से देखा समझा और तैयार किया जाना चाहिए .
कोई संसद किसी अंतर्राष्ट्रीय मसले पर यूँ ही एकाएक फैसले नहीं करती है। इसके लिए उसकी सुनियोजित नीति होती है , अंतर्राष्टीय पेंच होते है ,लम्बा समय होता है ,गुट होते हैं और स्वार्थ निहित होते हैं . हालाँकि कहा जा रहा है ये पाक संसद जाने की तैयारी में है और एकाएक फैसले उस नीति का हिस्सा हो सकते है . लेकिन यह फैसला कई हिज्जों और अर्थों में बंटा ,फैला लगता है .इसे यूँ ही छोड़ देना बे-मायने होगा और नुकसान देह होगा .
जो नीति गहरी और अनेक अर्थों वाली होती है वह कूटनीति कहलाती है . पता नहीं हमारी सरकार ने और नेताओं ने पाक संसद की इस कूटनीति को परदे के पार से देखा है या नहीं .लेकिन जाहिर है कि पाक की इस नापाक हरकत के पीछे कोई गहरी अन्तराष्ट्रीय चाल है .इसके पीछे वहां के चुनाव हों तो हमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन पाकिस्तान इस मुद्दे को संसद के भीतर से उठा कर अन्तराष्ट्रीय बना रहा है . वह कश्मीर मसले पर दुनिया को जताना चाहता है कि भारत में कश्मीरियों को आज़ादी नहीं है . दूसरा वह आतंकियों की अपरोक्ष मदद कर रहा है वहीं कश्मीरियों की रहनुमाँई का पक्षधर बन रहा है .
फिर भी पाक संसद के भीतर से कोई प्रस्ताव भारत की निंदा करे वह भी संसद पर आतंकी हमले के आरोपी के पक्ष में तो इसके इसके समझे गए गूढ़ अर्थ आगे की अन्तराष्ट्रीय खुरपेंची कहा जा सकता है जिसके पीछे यूरोप पार के देश और नेता हो सकते है जो आतंकवाद समेत कश्मीर और अन्यों मसलों पर भारत के खिलाफ हैं और जहर उगलते आ रहे हैं . हम देख रहे है आतंकवाद से लड़ने वाले कई देश जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन भी हैं भारत -पाक के बीच चल रही आतंकी घटनाओं और विवादों पर या तो भारत के साथ नहीं है या दिखावे के लिए साथ नज़र आते हैं .ऐसे देशों की नई कूटनीति का हिस्सा हो सकता ये पाक संसद का प्रस्ताव . इसलिए सजगता से ,गहराई से इस मसले का अध्ययन करने ,इसके पेंच ढूढ़नें और समझने की जरुरत है सिर्फ गुर्राने से काम नहीं चलेगा काट भी जरुरी है
सुरेन्द्र बंसल
कोई संसद किसी अंतर्राष्ट्रीय मसले पर यूँ ही एकाएक फैसले नहीं करती है। इसके लिए उसकी सुनियोजित नीति होती है , अंतर्राष्टीय पेंच होते है ,लम्बा समय होता है ,गुट होते हैं और स्वार्थ निहित होते हैं . हालाँकि कहा जा रहा है ये पाक संसद जाने की तैयारी में है और एकाएक फैसले उस नीति का हिस्सा हो सकते है . लेकिन यह फैसला कई हिज्जों और अर्थों में बंटा ,फैला लगता है .इसे यूँ ही छोड़ देना बे-मायने होगा और नुकसान देह होगा .
जो नीति गहरी और अनेक अर्थों वाली होती है वह कूटनीति कहलाती है . पता नहीं हमारी सरकार ने और नेताओं ने पाक संसद की इस कूटनीति को परदे के पार से देखा है या नहीं .लेकिन जाहिर है कि पाक की इस नापाक हरकत के पीछे कोई गहरी अन्तराष्ट्रीय चाल है .इसके पीछे वहां के चुनाव हों तो हमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन पाकिस्तान इस मुद्दे को संसद के भीतर से उठा कर अन्तराष्ट्रीय बना रहा है . वह कश्मीर मसले पर दुनिया को जताना चाहता है कि भारत में कश्मीरियों को आज़ादी नहीं है . दूसरा वह आतंकियों की अपरोक्ष मदद कर रहा है वहीं कश्मीरियों की रहनुमाँई का पक्षधर बन रहा है .
फिर भी पाक संसद के भीतर से कोई प्रस्ताव भारत की निंदा करे वह भी संसद पर आतंकी हमले के आरोपी के पक्ष में तो इसके इसके समझे गए गूढ़ अर्थ आगे की अन्तराष्ट्रीय खुरपेंची कहा जा सकता है जिसके पीछे यूरोप पार के देश और नेता हो सकते है जो आतंकवाद समेत कश्मीर और अन्यों मसलों पर भारत के खिलाफ हैं और जहर उगलते आ रहे हैं . हम देख रहे है आतंकवाद से लड़ने वाले कई देश जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन भी हैं भारत -पाक के बीच चल रही आतंकी घटनाओं और विवादों पर या तो भारत के साथ नहीं है या दिखावे के लिए साथ नज़र आते हैं .ऐसे देशों की नई कूटनीति का हिस्सा हो सकता ये पाक संसद का प्रस्ताव . इसलिए सजगता से ,गहराई से इस मसले का अध्ययन करने ,इसके पेंच ढूढ़नें और समझने की जरुरत है सिर्फ गुर्राने से काम नहीं चलेगा काट भी जरुरी है
सुरेन्द्र बंसल
Sunday, March 10, 2013
सवालों के मोल तौल
यह हैरत तो नहीं है लेकिन अजीब है कि संवैधानिक संस्थाओं के भीतर ऐसे लोगो की घुसपैठ जारी है जो अपने हित के लिए रुख,रवैया और नियम को रुखसत करने की कोशिश करते है .ताज़ा मामला मप्र विधानसभा का है जहाँ सत्तारूढ़ दल के एक विधायक को एक सड़क निर्माण करने वाली कम्पनी ने प्रलोभन देकर घटिया निर्माण पर सवाल पूछने से रोकने की कोशिश की. और ख़ास यह है कि विपक्षी दल के विधायक को सदन से अनुपस्थित रहने के लिए मना लिया गया. मामला नया है और संभवतः मप्र में पहला लेकिन तरीका पुराना है और आरोप है कि विधानसभा से संसद तक सांसद और विधायकों के सवालों की खरीद फरोख्त होती रही है .
सत्ताधारी दल के विधायक ने मामला खोल दिया लेकिन विरोधी पक्ष जिस पर सरकार को घेरने और रास्ते पर चलने के लिए बाध्य करने का दायित्व है उनके विधायक के सेट हो जाने का दावा किया गया है . यह उलटबांसी है आखिर जिम्मेदारी और कर्तव्य जैसे शब्द महज शब्दकोष के अंग ही नहीं है उनके शाब्दिक अर्थ नैतिक मूल्यों को इंगित करते हैं .लेकिन जब ऐसे लोग जो जिम्मेदारी और कर्तव्य को परे रख कर सौदे करने लगते है और कार्यपालिका ,विधायिका को प्रभावित करते है वे अपनी अनैतिक नीति से राज़ को आहत करने के दोषी हैं .
मामला एक सवाल का नहीं है, उस चलन का है जो बदस्तूर जारी है. नियम को धता बताने वाले लोग सक्रियता से काम कर रहे हैं इस सवाल से पहले भी और भी सवाल हुए होंगें जिन्हें रोका गया होगा, ख़रीदा गया होगा और राज्य को धता बताकर अपने कायदों से चलाने की कोशिश की गयी होगी . सरकार कभी क्या ऐसे सवालों के पूछने ,रुकने और मकसद की पड़ताल करती है . संवैधानिक संस्था के भीतर सांसदों और विधायकों के कार्य , संलिप्तता की मानिटरिंग क्यों नहीं होती. यूँ हर राजनैतिक दल को अपने सदस्य की मोनिटरिंग करना चाहिए ,सवालों के पीछे के मकसद यदि है तो उनकी पड़ताल की जाना चाहिए, उन्हें पार्टी की नीति के साथ नैतिकता और कर्तव्य पर भी ध्यान देना चाहिए . न जाने कितने सवालों के पीछे इस तरह की कहानी दोहराई गयी होगी लेकिन यहाँ सब कुछ चलता है की तर्ज़ पर जानकर भी चलने दिया जाता है
कांग्रेस के विधायक पर जिन सवाल पूछकर गायब रहने का आरोप है और जो सवाल पूछने के लिए नहीं बिक़े उन्हें परोक्ष मान कर राजनैतिक दलों को मान और दंड तय करना चाहिए . यह भी तय होना चाहिए कि कोई सवाल पूछकर किस मकसद को पूरा कर रहा है स्वहित या राज्य हित . इसके लिए एक दांडिक प्रक्रिया निहायत जरुरी है।
सुरेन्द्र बंसल
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