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Sunday, May 13, 2012

वह मेरी माँ है



भगवान  से  कोई  बढकर  है
तो  माँ  है ,
दुःख  में  कहीं  आंसू  है   
तो  माँ  है ,
सुख  में  कहीं  लब पर  मुस्कान  है  
तो  माँ  है ,
जिंदगी  की  कोई  पहरेदार  है  
तो  माँ  है ,
ईमान  की  कोई  इबारत  है  
तो  माँ  है ,
ख़ुशी  का  कहीं  दरिया  है  
तो  माँ  है ,
छुपने  का  कहीं  आँचल  है  
तो  माँ  है 
मंजिल का  कोई  ठिकाना  है  
तो माँ  है ,
डांट  में  भी  प्यार  है  
तो  माँ  है 
दूर  हुए  रिश्तों  का  कोई  जोड़  है  
तो  माँ  है 
बेटा  किसी  के लिए  हीरो  है  
तो  वह  माँ  है 
जो  दुःख  भूल  सुख  बाँटें 
वह  मेरी  माँ  है 
भगवान्  से  जो  बढकर  है  
वह  माँ   है .....
- सुरेन्द्र बंसल 
सित. 2011

Tuesday, May 8, 2012

" APPRECIATION "

जिंदगी का सबसे बड़ा अवार्ड क्या है ? अंग्रेज़ी में एक  शब्द है " APPRECIATION  "
मैं सोचता हूँ यही जिंदगी का सबसे बड़ा अवार्ड है जब कोई आपको तहे दिल से APPRICIATE करे.
आपने कुछ लिखा बहुत से लोग पढ़ लेते हैं ,पर जब कोई कहे की आप हज़ारों लोगो के दिलो की बात लिखते है ,
आपके एक एक शब्द अपने अर्थ को जीवंत महसूस कराते हैं .
आज ऐसे ही मेरे एक FB  मित्र  ने व्यक्तिगत मुलाक़ात में मुझे अपनी अंतर भावनाओं का
यह प्रेम मिठास भरा अवार्ड मुझे प्रदान किया  . यह मेरे लिए अमूल्य तोहफा है ,
एक लेखक क्या चाहता है - 'उसकी सरस्वती की क़द्र हो '
मेरे ब्लोग्स पढ़कर आत्मीय अनुभूति करने वाले समस्त पाठक मित्रों का आत्मीय अभिवादन !

Saturday, May 5, 2012

अपना नहीं राष्ट्र का प्रतिनिधि चुनो भाई !


दो  महीने  में देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया जाएगा लेकिन नए राष्ट्रपति को लेकर जो कवायदे की  जा  रही  है  उससे कहीं नहीं  लगता कि राष्ट्रपति के लिए वोट वेल्यू रखने वाली राजनैतिक पार्टियाँ देश का राष्ट्रपति चुनने जा रही हैं . अभी तक जो नाम जिस तरह से सामने आ रहें हैं उनसे लगता हैं हर राजनैतिक दल अपना राष्ट्रपति चुनना चाह रही है . देश में इस तरह का चलन राष्ट्र के प्रति राजनैतिक जिम्मेदारी से दूर हटना है 

दरअसल विधायकों और सांसदों की वोट वेल्यू के आधार पर चुने जाने वाला राष्ट्रपति हमारी वैश्विक राजनीति और कूटनीति की प्रतिष्ठाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए , लेकिनं इस समय जो मांग और नाम चल रहे  हैं उनमे कहीं यह नहीं लग रहा जो कह सके कि यह नाम हमारी आवश्यक प्रतिष्ठाओं के अनुरूप है. अभी नाम चलाने वाले खासकर छोटे और क्षेत्रीय दल जो नाम लेकर आ रहे हैं वे सब अपनी दलगत  राजनीति के स्वार्थ वश ही ला रहे हैं . यहाँ तक कि पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के नाम भी उनकी स्थापित प्रतिष्ठाओं  के अनुरूप नहीं उनकी सामाजिक और धार्मिक स्थितियों के अनुसार लिए जा रहे हैं . अब किसी ने यह भी कह दिया है इस बार राष्ट्रपति ईसाई समुदाय से होना चाहिए .

यह देश की विडम्बना है आज सर्वोच्च पद के लिए सर्वोच्च व्यक्तित्व की चाहत और नितान्तता जरुरी नहीं रह गयी है , तुष्टिकरण  के साथ आज राज दलों ने इसे वोट खरीदने का औज़ार बना लिया है क्या देश का राष्ट्रपति राजनैतिक दलों की बखत बढ़ाने का जरिया है ? राष्ट्रपति से तो राष्ट्र की बखत बढ़ना चाहिए. लेकिन अपनी अपनी राग से सभी दल अपना हित साध रहे हैं . क्या हम वाकई धर्म निरपेक्ष हैं ? यह सवाल हमारी धर्मनिरपेक्षता पर स्वयं एक प्रश्न है . क्यों नहीं देश प्रतिष्ठित,सम्मानित ,सर्वथा योग्य पद  पर एक मत से विचार नहीं कर सकता ?
सुरेन्द्र बंसल

Saturday, April 28, 2012

कल ही मैंने एक दर्द खरीद लिया है

लो खुश हो जाओ तुम भी
ऐ मेरे मित्र,
कल ही मैंने 
एक दर्द खरीद लिया है
इन पैसों से चाहता था 
कुछ  ले आऊँगा घर 
माटी, कंकर ,घासफूस ,
तिनके ,टुकड़े ,लकड़ी ,पत्थर 
रखकर टीला बना लूँगा 
चढ़ जाऊँगा उस पर तन कर 
कुछ उंचा उठ जाऊँगा
रुक गया यहीं पर 
थाम लिया अपने को 
अपने के भीतर 
थम जाओ सुरेन्द्र तुम 
अब यहीं   तक 
दूसरे को लिए जिते रहे
 हो  अब तक
उन्हें खुश ही रहने दो 
बढ़ रही है ख़ुशी तुम्हे 
ऐ मुसाफिर 
घर लौटने के पहले ही 
एक दर्द खरीद लो
लो खुश हो जाओ 
ऐ मेरे मित्र तुम भी 
कल ही मैंने 
एक दर्द खरीद लिया है ..
-सुरेन्द्र बंसल   
21 APRIL12

Saturday, April 21, 2012

मोहर सरकार की लुंजपुंजता पर...


खास आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने सीधे और सपाट लफ्जों में कटु सत्य कहा था कि भ्रष्टाचार और घपले भारत के आर्थिक विकास में बाधक है और अगले चुनाव तक आर्थिक विकास की दशा सुधरने की संभावना नहीं है . जाहिर है सत्य की चुभन तेज़ होती है सो इसका अंदाज़ प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की उस साफगोई में दिखा जिसमें उन्होंने नौकरशाहों को हिदायत दी कि वे सख्ती  से काम ले.
बातें दोनों ही अपनी जगह सही और सटीक है लेकिन ये इस तथ्य को भी जाहिर करते हैं कि  सरकार के भीतर कामकाज और वातावरण ठीक नहीं है . सरकार बैठी नहीं चलती रहना चाहिए . नौकरशाहों में श्री बसु का प्रतिनिधित्व बयान माने तो यह साफ़ लगता है कि चुने हुए लोग और राष्ट्र की धारा को प्रभावित करने वाले तत्व भ्रष्टाचार और घोटाले से राष्ट्र का बे-इन्तहा नुकसान कर रहे हैं . श्री बसु ने यह वाशिंगटन की एक संस्था के कार्यक्रम में कहे इसलिए उनके बयान का महत्व और असर अंतर्राष्ट्रीय है . जब बातें चल निकलती है  तब उसका आकलन तथ्यात्मकता के परिप्रेक्ष्य में होने लगता है और इशारों ही इशारों में बड़ी बड़ी बातें सामने आ जाती है .
चूँकि श्री बसु सरकार के भीतर बड़े प्रशासनिक ओहदे पर हैं तो बात का फैलाव ज्यादा और प्रमाणिकता भी ज्यादा नज़र आने लगी लिहाजा सरकार पर प्रश्नचिन्ह इस बात का है कि क्या यह विश्वसनीय सरकार है? दरअसल श्री बसु के बयान से ऐसे कटघरे का निर्माण हो गया जिसके अंदर ऐसे लोग अनायास आ गए हैं जो सरकार चलाने के लिए जिम्मेदार हैं .इसलिए भ्रष्टाचार और घोटाले की जिम्मेदारी कहीं नज़र आई तो वह भी नौकरशाहों से अलग उन प्रतिनिधियों पर आई जो प्रजातंत्र में चुने हुए लोग हैं.लिहाज़ा इस अनपेक्षित आक्रमण पर सबसे पहले जरुरत विश्वसनीयता  बचाने की होना चाहिए थी इसके लिए प्रधानमंत्री से बेहतर और कोई नहीं था , सो मनमोहनसिंह ने नकेल कसने के लिए कह दिया कि नौकरशाहों को सख्ती से काम लेना    चाहिए याने वे भ्रष्टाचार या किसी तरह का घपला देखते हैं या इस तरह कि किसी दखलंदाज़ी देखते हैं तो उन्हें सख्त होकर उससे निबटना चाहिए . प्रधानमंत्री स्वयं किसी समय एक बड़े ब्यूरोक्रेट रहे हैं और नौकरशाही किस तरह चलती है वे अछि तरह जानते हैं ऐसे में उनका बयान इसलिए महतवपूर्ण है कि किसी भी मसाले पर सम्बंधित विभागीय अफसर अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति देने का अधिकार रखते हैं यदि वह उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो भ्रष्टाचार और घोटाले जैसे काण्ड होते रहेंगें , प्रधानमंत्री अनुसार लगता है नौकरशाहों की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा है .
बहरहाल एक बात साफ़ है.भ्रष्टाचार और घपले राष्ट्र की विकास धारा को रोक रहे हैं और यह विचार कौशिक बसु के विचार से मेल खाता है फिर चाहे शासन के चुने हुए प्रतनिधियों के द्वारा हो रहा हो या नौकरशाहों की अनदेखी से . शासन और प्रशासन दोनों सरकार के ऐसे अंग हैं जो एक सम्पूर्ण सरकार का निर्माण करते हैं यदि दोनों ही जिम्मेदारी से काम नहीं कर रहे हैं जैसा इनके बयानों से लग रहा हैं तो जाहिर है गड़बड़ बड़ी है और राष्ट्र में एक लुंजपुंज सरकार चल रही है जो इस परिस्थितियों से नहीं निबट सके तो वह ढीली और बेअसर सरकार होती है . आज मोहर इस बात की लग गयी है इसलिए कि दोनों ही बयान दोतरफा गड़बड़ी का बड़ा संकेत डे रहें है .
सुरेन्द्र बंसल 
कॉपी राइट ;surendrabansal@blogspot.com

Thursday, April 19, 2012

कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ सांस उधार ले ले,


मौत अभी कुछ दूर है 


कुछ दुआ साथ ले ले


शांति का मरघट 


यूँ नहीं पास आएगा 


हो सके हाथ में 


कुछ  देर जाम ले ले 


देख कुछ  लोग पी पी कर मर रहे हैं 


हो सके तो तू भी 


कुछ देर इसका मज़ा ले ले 


कुछ ठहर ऐ जिंदगी


कुछ सांस उधार ले ले..
सुरेन्द्र बंसल

औरों के लिए . by Surendra Bansal on Wednesday, April 18, 2012 at 10:01pm ·


मैंने भी जिंदगी मैं उस चट्टान के पत्थर बीने हैं ,
जो कल तक तराशे गए कि काम  लायक थे 
नाकाम पत्थरों  को कौन उठाता है
न मंदिर बनाता है न कब्र , 
पत्थर बीनते बीनते 
चट्टान से इस तरह लुडक गया हूँ 
जैसे स्वयं पत्थर बन गया हूँ..

जिंदगी जब पथरा जाती है इस तरह 
संघर्ष टूट जाता है टूटते तारों की तरह 
तब कोई नहीं होता उस पत्थर का 
और वह फिर तराशा जाता है 
औरों के लिए ......