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Thursday, October 1, 2015


सन्नाटा पसरा था
अखबार ने हलचल मचा दी
कुछ डर गए सहम से गए
मै नवीस अखबारी
बस बिखर सा गया
सुरेन्द्र बंसल 12.05/03062015

संभावना का राज्योद्य!

संभावना का राज्योद्य! 
उगते हुए और महत्वकांक्षाओं के पालतू राजनैतिक लोगों को आज खबरदार हो जाना चाहिए । एक इंदौरी नेता राष्ट्रीय राजमण्डल पर उभर रहा है । इंदौर के कैलाश विजयवर्गीय बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए हैं । भाई पत्रकारिता के इतर मुझे बहुत ख़ुशी है। बरसों से यह अरमान संजोय बैठा था इंदौर से राजनैतिक उपज की शीर्ष पैदावार हो । यह साल बहुत अच्छा है या यूँ कहे इंदौर के अच्छे दिन आ गए हैं। एक साथ दो नेता बड़े पदों पर काबिज़ हुए है । हमारी सौम्य ताई यानी सुमित्रा महाजन लोकसभा के सर्वोच्च पद पर आसीन है उनकी आसंदी है और बाक़ी सभी की सीटें हैं । गर्व और गौरव है हमें आज कैलाश विजयवर्गीय देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी में महासचिव नियुक्त हुए हैं ।
मेरे अंदर की अभिलाषा और बढ़ रही है कुलाचें मार रही है ।दरअसल मेरा सपना है प्रदेश का मुख्यमंत्री इंदौर से हो। भाई शिवराज जी मुझे माफ़ करना इसलिए कि आप एक अच्छे और नेक इंसान हैं । मैं कैलाश को आगे करके आपको कोई चुनौती नहीं देना चाहता बस मैं इंदौर के राज नेतृत्व को आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ । मेरे लिए यह असह्ज ,असह्य और असम्मान है कि मैं इंदौर में जन्मित होकर आज तक प्रदेश के इस सबसे बढ़े शहर से कोई मुख्यमंत्री नहीं देख सका ,मुझे अब तक कुंठा होती रही है । प्रकाशचंद सेठी इंदौर के कहलाये पर असल में वे भी उज्जैन से थे। मैंने इंदौर की राजनीति को बेहद करीब से देखा है। अपने दौर में मैंने इंदौर से मुख्यमंत्री की कई सभवनाओं को तलाशते हुए कभी सुमित्रा महाजन की और देखा तो कभी कैलाश विजयवर्गीय की ओर। दरअसल मुझे इन दोनों में ही मेरे सपने की सम्भावना नज़र आती थी, इसलिए ताई के शुरूआती पारी में ही मैंने जनसत्ता में प्रकाशित एक ऐसा इंटरव्यू किया जिसमें एक ही तरह के सवाल दोनों लोकसभा उम्मीदवार पी सी सेठी और सुमित्रा महाजन से किये गए थे , सम्भवतः इस तरह का देश में पहला इंटरव्यू था। कैलाश विजयवर्गीय के लिए जनसत्ता में ही एक बार जब लिख दिया कि इस युवा राजनैतिक में भविष्य की अपार संभावना है तो कैलाश जी ने ही टोका बंसल जी इतना आगे मत बढ़ाओं बहुत जल्दी हो जायेगी।
लेकिन कैलाश विजयवर्गीय आगे बढ़ते गए और आज उस मुकाम पर हैं जहाँ से हम अपने प्यारे शहर से राज नेतृत्व का शीर्ष देखना चाहते है फिर यह राज नेतृत्व हमें सुमित्रा ताई से मिले या कैलाश विजयवर्गीय से ।एक बार पुनश्च माफ़ी आदरणीय शिवराज जी चौहान से आखिर यह संभावना का राज्योद्य है !!
सुरेन्द्र बंसल

सावधान हो जाइये

सावधान हो जाइये 
आज केजरीवाल कह रहे थे जैसे उनके मंत्री तोमर के मसले पर वे धोखे में रहे उस तरह मोदी जी सुषमा और वसुंधरा के मसले पर धोखे में न रहे । जाहिर है तोमर की चार सौ बीसी से दिल्ली सरकार की लख लख बदनामी के बाद केजरीवाल खबरदार हो गए हैं और प्रधानमंत्री मोदी को चेता रहे हैं वे बेखबर न रहें।
दरअसल सारे मामले बेखबर रहने के हैं ।आप जब अपने मग्न में होते हो तो बहुत सी बातों से बेखबर हो जाते हैं । सजगता खबरदार रहने का पर्याय कर्म है। इससे दूर रहना याने बेखबर हो जाना है। सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे का दोष बेखबर रहना है। मैं यह नही। मानता कि सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे ने किसी स्वहित , आर्थिक हित से ललित मोदी को मदद की थी । ये दोनों राजनीति के साफ़ सुधरे और उजले पक्ष हैं फिलवक्त इनमें दाग ढूँढना एक तरह से बदनियति है। राजनीति में जब अच्छे कार्मिक लोगों की फेहरिस्त बनायें तो इन नामों को अलग नहीं किया जा सकता । फिर ललित मोदी के साथ नाम जोड़ा जाना उपयुक्त नहीं हैं।
फिर भी इन्हें सजग चौकन्ना तो रहना ही था और जब आप सार्वजनिक जीवन में हों तब आपकी जवाबदारी और बढ़ जाती है । सुषमा स्वराज और वसुंधराराजे ने यही गलती की है । सजगता को खो कर उन्होंने मर्यादित नीति को छोड़ दिया ।
देश को आज भी अच्छे राजनीतिज्ञों की अहम जरुरत है। ऐसे मसलों की अनदेखी करना कीचड के रास्तों पर बेखबर चलना है फिर दाग तो लगेंगे ही । सावधान हो जाइये वक़्त बहुत है लेकिन वक़्त दोबारा मौका नहीं देता ।
सुरेन्द्र बंसल 12.45/24.6.15

आपातकाल - चलते जीवन को दखल करने का दोष

..सुरेन्द्र बंसल का पन्ना
आपातकाल - चलते जीवन को दखल करने का दोष
26जून 1975 को देश एक काले दिन की तरह याद करता है। जब सत्ता में बैठे लोगों को जन जागरण का डर सताने लगा तो इस आपात स्थिति से निबटने के लिए रातों रात आपातकाल लगा दिया गया। मतलब सत्ता के लिए निर्मित आपात् परिस्थितियों से भयमुक्त होने के लिए लगाया गया आपातकाल । 19 महीने इस देश ने ऐसी निरंकुश व्यवस्था देखी और भोगी है जो तंत्र की सारी लोकलाज़ और मर्यादा को तोड़कर भय, दबाव,ज्यादतियों के तहत बेखबर चलती रही।
उन दिनों अपन लड़कपन में थे स्कूल से कॉलेज में प्रवेश किया ही था विज्ञान विषय था । कॉलेज के इस प्रवेशकाल में ही आपातकाल का सामना हुआ। महसूस हो रहा था सामान्य जीवन एक अनियंत्रित दाब के तले चल रहा है और जिसके पास जो कुछ पावर है उसका वह बेज़ा इस्तेमाल कर रहा है।
उस दौर में अपने साथ दो घटनाएं हुई जिसनेे अपना कॅरियर ही तबाह कर दिया। गुजराती कॉलेज में एक शिक्षिका अंग्रेजी का अध्यापन कराती थीं उनका बहुत रुतबा था। चाहें जिसको वह खड़ा कर डपट देती थी जो कार्नर पर बैठा करता उसकी तो मुसीबत ही थी कब वह सेकंड कार्नर थर्ड कार्नर से सवाल कर दे पता नहीं। आपातकाल के ही दिनों में उन्होंने पहले मित्र राकेश साहू फिर पटेल और एकाएक अपने को खड़ा करके क्लास से बाहर कर दिया फिर सस्पेंड का नोटिस भी दे दिया। अपन शुरू से स्वाभाविक सीधे सरल सच्चे और संयत रहे हैं कुछ समझ नही आया क्यों सस्पेंड किया। बहुत से प्रेक्टिकल छूट गए पर सस्पेंशन वापस नहीं हुआ बेवजह पिताजी को शर्मिंदा होना पड़ा ।अपने को आज तक नहीं पता अंग्रेज़ी की मेम ने हमें किन वजहों से मेमना बना दिया था।
दूसरी घटना भी उन दिनों कुछ इस तरह से हुई कॉलेज के गेट पर हम तीन दोस्तों का आमना सामना हुआ हाथ मिलाया ही था कि एक एस आई बाइक पर आ धमके और मित्र ब्रह्मप्रकाश दीक्षित प्रदीप टोंग्या सहितबिलावजह हमें रिक्शे में बैठाकर छावनी थाने ले आये ।जाहिर है थाने जाना याने अपनी बेइज़्ज़ती कराना है सो न होकर भी हमे अपराधबोध सताने लगा वह तो भला हो थाने के टी आई सा का उनने देखते ही छोड़ दिया। लेकिन आपातकाल के उस दौर में इन दो घटनाओं का जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा । कॉलेज जाना कम हो गया तो क्लास अटेंड नहीं करना पढ़ाई के प्रति गंभीरता भी खत्म मानों जीवन को सही राह से भटक सा दिया। किशोरावस्था में ऐसी घटनाएं बहुत मायने रखती है। मै आज भी स्वयं को आपातकाल का शिकार मानता हूँ और इसी से यह समझ सकता हूँ कि निरंकुश व्यवस्था के उस दौर में कितने निर्दोष शिकार हुए होंगें।
बाद में जब मैं पत्रकारिता में सक्रिय हुआ तो यह जानकार विनम्र दुःख हुआ कि अंग्रेज़ी की अध्यापिका मेम उन श्रद्धेय संपादक की पत्नी थी जिन्होंने आपातकाल के विरोध में अपने अखबार का संपादकीय पृष्ठ को खाली और काला छोड़ दिया था।
आपातकाल की यह टिस आज भी कायम है आखिर चलते जीवन को दखल करने का दोष आपातकाल पर ही है।
सुरेन्द्र बंसल
12.20 26.6.15

कर्मयोग का सत्

कर्मयोग का सत्
सांसदों का वेतन दोगुना होने जा रहा है। इस पर बहुत हल्ला है आखिर क्यों सांसदों का वेतन बढ़ना चाहिए। लोग चाहे सो कहें मुझे तो वेतन शब्द पर ही आपत्ति है। वेतन उसे दिया जाता है जिसकी नौकरी हो , सांसद तो हमारे नेता हैं नौकर तो है नहीं फिर वेतन किस बात का । हर सांसद हमारा सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं फिर प्रतिनिधि को वेतन कैसे दिया जा सकता है। संविधान में व्यवस्था है वेतन की इसलिए इन्हें वेतन और पेंशन दिए जा रहे हैं । लेकिन इसके मूल को पुनः व्याख्यित किये जाने की जरुरत है।
हर सांसद सामाजिक कर्मयोगी है ,उसे लोग याने समाज का प्रतिनिधित्व उस दायित्व से करना है जो उसे सामुहिक तौर पर इस विश्वास से दिया गया है कि वह समाज ,क्षेत्र और राष्ट्र के लोकतान्त्रिक नेतृत्व एवं विकास में अपना योगदान पूर्ण क्षमता से देगा। उसका यही कर्म उसे राजनेता बनाता है । राजनीति में राजनीतिज्ञ को राजा मान लेने की भूल पर ही देश में राज का संचालन चल रहा है। सांसद याने जैसा मैंने कहा राजनीति के कर्मयोगी स्वयं को राजा अनुरूप शासक मानता है और जब पैसे की वैधानिक बात आती है तो नौकर की तरह वह वेतन चाहता है उसमें बढ़ोतरी चाहता है । भाई ये दो रूप नहीं चलेंगें आप विधिमान्य सांसद हैं जिसका मूलार्थ नौकर होने का कतई नहीं है कृपया प्रयास करें कि संविधान में बदलाव लाएं और वेतन जैसे शब्द को ही सांसद के लिए प्रयुक्त होने से रोकें।
देखिये आपको अपना समय सामूहिक व्यवस्थापन पर खर्च के बदले में सम्मान निधि के तौर पर मिलता रहे इसके खिलाफ मैं कतई नहीं हूँ लेकिन इसका तरीका बदला जाना जरुरी है। यह वेतन नहीं मेहनताना की तरह मानदेय के तौर पर दिया जाना चाहिए और इस मेहनताने का आकलन कार्य ,कार्यक्षमता , संलग्नता,नियमितता और भागीदारी के आधार पर होना चाहिए। फिर यह सम्मान निधि चाहे आज मिलने वाले वेतन से दोगुनी ही क्यों न हो।
मसलन संसद में आपकी उपस्थिति की गणना, भागीदारी की गणना, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की गणना, सामयिक बहस में हिस्सेदारी, राष्ट्र हित के लिए किये जा रहे वैचारिक मूल्यों की गणना पर जो सम्मान राशि बनती हो वह सांसद के प्रदर्शन से निर्धारित होना चाहिए। ऐसा किया जाता है तो मेरा मानना है राजनेता वाक़ई राजनेता कहलायेंगें उनका मान बढेगा देश बढेगा और राजनीति की दशा भी बदल जायेगी एक प्रयास इस तरह कीजिये माननीय मोदी जी। इसलिए भी कि आप खबरदार प्रधान मंत्री हैं आपकी संसद और सांसद भी बेख़बर नहीं होना चाहिए उनमे कर्मयोग का सत् आना ही चाहिए।
सुरेंद्र बंसल
12:23 4.7.2015

अंदाज़ अपना .........सुरेन्द्र बंसल का पन्ना....... कलंक लगाये नहीं जाते

अंदाज़ अपना .........सुरेन्द्र बंसल का पन्ना.......
कलंक लगाये नहीं जाते
आलोचना ,विरोध,प्रतिकार सब जायज है लेकिन इस तरह नहीं क़ि वह आपकी सोच,दृष्टि और विचार को एक तरफा घोषित करे। व्यापम के मामले में सब एक तरफ चल रहे हैं फौजी की तरह जैसे सामने सीमा पार दुश्मन हथियार लेकर खड़ा है उसे मारना ही है। मुझे समझ नहीं आता शिवराज सिंह प्रदेश के मुखिया हैं तो क्या आप सारे आरोप उन पर जड़ देंगें । शिवराजसिंह सरकार की गलतियों को में नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहता इसलिए भी कि इस घोटाले की खतरनाक करतूत उनके हो कार्यकाल में हुई है। मुझे आपत्ति है शिवराज को शव राज में प्रचारित प्रसारित करने से ।आप आलोचना में, विरोध में किस हद तक जायेंगें । भाई स्वस्थ आलोचना कीजिये,ये कोई खेल. मनोंरंजन,सनसनी की चीज़ नहीं है कि मुहावरे गढ़ कर मामले को संगीन बनाये। मामला चिंतनीय है इसे चिंतन से सही राह पर लाने की कोशिश पूरे ईमान से कीजिये। यह साफ़ होना ही चाहिए क़ि इतने आरोपियों की मौत कैसे हो रही है,क्या इन मौतों की वजह के पीछे गूढ़ रहस्य है। खोजिये भाई खोजिए सब मिलकर खोजिए ईमान से खोजिए, किसी को बख्शिये मत लेकिन आरोपों को संगीन मत बनाइये उसे खबर लायक बनाने की कोशिश मत कीजिये उसमें से खबर निकलने की कोशिश कीजिये।
शिवराज से तकिया कलाम शवराज बनता है तो इसे विहंगम प्रचार देकर अपनी बौध्दिकता को तो नीलाम मत कीजिये । जिस किसी ने शिवराज को शवराज कहकर प्रचारित किया है उसने एक बड़ा अपराध किया है। आपको पता नहीं है आप क्या कह रहे है। मप्र के मुखिया को शवराज बताकर प्रदेश को किस तरह की भूमि बता रहे हैं मुझे यह कहने की जरुरत नहीं है । न मेरा प्रदेश इस तरह का है और न ही मेरा प्रदेश चलाने वाले। आप क्या वाक़ई सोचते है क़ि व्यापम के 45 या आसपास की मौते किसी भी सरकार के लिए आसान है जो अब तक नहीं हुआ क्या वह इस प्रदेश में हो रहा है । भाई मामले की तह तक जाओ,इतने लोग मरे हैं तो खोजो भाई ऐसा कैसे हो रहा है यह खोज ही पत्रकारिता है। बातये 45 मौतों के बाद भी क्या कोई यह खोज सका है कि कौन जिम्मेदार है और क्या वाक़ई ये हत्याएं हैं ??? नहीं न फिर संयम होकर स्वतंत्र और निष्पक्ष खोज जारी रखिये शवराज कहने भर से कोई रहस्य नहीं खुल जायेंगे जो अपने आप लगते हैं वह कलंक होते हैं और जो कलंक लगाये जाते हैं उस पर आप खुद विचार कर लीजिये।
सुरेन्द्र बंसल
10:45 7.7.2015

एक दिन तो गुजारिये झुग्गी में

अंदाज़ अपना............सुरेन्द्र बंसल
एक दिन तो गुजारिये झुग्गी में
बहुत अज़ीब बात हैं न ....मैं खुद कभी किसी झुग्गी में नहीं गया आपसे कह रहा हूँ एक दिन तो गुजारिये । रात भर की बारिश में यह चिंता सताती रही नए बने पक्के मकान में कहीं से पानी तो नहीं टपक रहा है, रात तीन बजे पूरे घर में घूमा व्यवस्था की ।सुबह ही कलेक्टर साब नरहरि जी को मैसेज कर दिया......
सुप्रभात
सर झुग्गी में सड़क किनारे नाले पर रहने वालों का ख्याल रखियेगा बारिश में.....
मानवीय संवेदना की अनुभूति लिए कलेक्टर साब ने तुरतफुरत जवाब दिया श्योर (जरूर).......
दरअसल हम अपने लिए कितनी चिंता करते हैं व्यर्थ तो नहीं करते लेकिन छोटी छोटी मुसीबतों से घबरा जाते हैं। स्वयं के लिए व्यवस्था के लिए जुट जाते हैं ।कैसी संचेतना और स्फूर्ति होती है उस समय । यह संचेतना चिंता की तात्कालिक उपज होती है और उस चिंता को दूर करने का प्रयास हमारे इर्दगिर्द होता है। लेकिन चिंता के साथ एक चिंतन भी जरुरी है । विचार कीजिये ऐसे हज़ारों लोग हैं जो टाट के पैबंद लगे फटी सड़ी पन्नियों के भीतर गुज़रबसर इस अहसास से कर रहे हैं क़ि उनका भी अपना घर है । बस यही अहसास उन्हें शाम को अपने घर ले आता है जिसे हम झुग्गी कहते हैं। गर्मी में लू के थपेड़े जिस घर में बेधड़क आते हों, ठण्ड में सिरहा देने वाली सरसराती लहर कंपकपा देती हो और बारिश में भीग जाने डूब जाने की बात आम हो फिर भी वह घर हो चिंतन करके देखिये कितने पल हम इस घर में रह सकते हैं ,पर इन भारी भरकम चिंताओं से बेखबर ये वे लोग है जो सिर्फ अपनी रोटी की जुगाड़ के लिए मुस्कुराते हुए झुग्गी घर से बाहर आते हैं और हमारा बोझ उठाते हैं, हमारे आशियाने बनाते हैं ,हमारे लिए सब्जी फल लाते हैं ,हमारे घरों दफ्तरों की सफाई करते हैं ,अपने बच्चों को लावारिस सड़क पर छोड़ कर हमारे बच्चों को सँभालते हैं याने हमारे सर्वसुख के लिए अपना सब त्याग कर जब वे वापस घर लौटते है तो घर में आटा गिला मिलता है गुदड़ी गीली मिलती है लकड़ी भीगी मिलती है । उन्हें भूखा रहकर भी सोने की जगह तब नहीं होती और इसी ऊहापोह सी जिंदगी में सबेरा हो जाता है इसे कौन सबेरा कहेगा शायद सबेरा भी उनकी नसीब में नहीं होता । और हम चौखट पर खड़े इंतज़ार में लालपिले हो रहे होते हैं
आप एक दिन गुजरात में गुज़ारें या मप्र में किसी मोहक सरकारी विज्ञापन को देखकर पैसा लगेगा मज़ा हिलोरे लेगा लेकिन जिंदगी का अनुभव नहीं आएगा। एक दिन गुजारिये किसी झुग्गी में और अपनी मानवीय संवेदनाओं को जगाकर देखिये आपकी खुशियों के व्यवस्थापक कितनी अव्यवस्थित जिंदगी बसर कर रहे हैं , हो सके तो इस गीले मौसम में उनके लिए सूखी बिछात या छप्पर ले आइये ।
- सुरेन्द्र बंसल
12.36 19.7.2015